कविता

कभी यूं भी

कभी यूँ भी
कभी तुम खुद चले आना
कभी तुम मुझे बुला लेना
फुरसत के उन पलों में
तन्हा ना तुम कभी रहना
चाहो तो याद कर लेना
या फिर
दिल कहीं और लगा लेना

कुछ बातें तो आज भी
अधूरी ही हैं तेरे बिना
मिले अगर पूरी कर लेना
कभी तुम खुद चले आना
कभी तुम मुझे बुला लेना

मैं तो वहीं ठहरी रही
कारवां वहीं से गुजरता रहा
धूल झाड़ता रही यादों से
बर्फ कुरेदता रही जख्मों से
चिनगारी बुझने न दी हमने
सांसों से हवा करती रही
कि इन्तेजार तेरा करती रही
कभी तुम खुद चले आना
कभी तुम मुझे बुला लेना

मेरा जो तेरे पास है
तेरा जो मैंने संभाले हैं
उन्हें सहेज कर रखना है
हिसाब तुझसे क्या करना अब
मुस्कुराहट लबों पे सजाए रखना
कभी तुम खुद चले आना
कभी तुम मुझे बुला लेना

जब तुमको था हमने देखा
जाने कहां खोये थे तुम
बहुत दूर से ही सही
तुमको मैंने बड़ी करीब देखा

किसी से कुछ कहना नहीं
तुम से जो बात थी
तुमसे मिलके ही कहना है
कभी तुम खुद चले आना
कभी तुम मुझे बुला लेना