कविता

मजदूर

मैं मजदूर हूं,
नवनिर्माण मैं करता हूं,
रहने को छत जुटा न पाऊं,
महल खड़े मैं करता हूं.

मैं मजदूर हूं,
खेतों में मैं खटता हूं,
मेरा पेट भरे-न-भरे,
औरों के पेट मैं भरता हूं.

मैं मजदूर हूं,
वस्त्र अनेक मैं बुनता हूं,
तन भी ढंग से ढक नहीं पाऊं,
औरों के तन ढकता हूं.

मैं मजदूर हूं,
चरण-पादुका बनाता हूं,
नंगे पैर मैं मीलों जाऊं,
फिर भी काम मैं करता हूं.

मजदूर हूं, मजबूर नहीं,
जहां काम मिले रहूं वहीं,
फुटपाथ पर भी रह लेता,
मुझे किसी से शिकवा नहीं.