कहानी

झोपड़पट्टी से फेलोशिप तक

“यूनिवर्सिटी द्वारा मेरिट और अकादमिक रिकॉर्ड के आधार पर आपको अमेरिका की सबसे प्रतिष्ठित फेलोशिप में से एक ‘चांसलर फ़ेलोशिप’ दी जाती है.” सरिता के पास आया यह मैसेज मानो जिंदगी की अनमोल खुशी का मैसेज था.
“यह तो अब की बात थी, तब!” सरिता की विचार-लहरी बह चली.
“हम सब भाई-बहन पापा जी के साथ सड़क-किनारे फूल बेचते थे. जैसे ही रेड लाइट होती, सारी गाड़ियां रुक जातीं और हम भाई-बहन हाथ में फूल लेकर दौड़ पड़ते गाड़ी वालों को लेने के लिए निहोरे करने!” बीते बचपन की एक-एक बात उसकी आंखों में तैर गई.
“निहोरे भी क्या हर समय काम आते थे! कोई-कोई सहृदय तो बिना तोल-मोल किए तुरंत सारे फूल खरीद लेता, कोई न तो गाड़ी की खिड़की खोलता न इधर देखता. रेड लाइट बुझते ही हमारी उम्मीदों के दिए भी बुझ जाते!” सरिता के सामने सारा मंजर नमूदार हो गया.
“शुक्र है पापा ने हमें स्कूल में दाखिला दिलवा दिया था. मेरी प्रतिभा से टीचर जी बहुत प्रभावित थीं और पापा जी को बुलाकर बधाई भी दी थी और आगे पढ़ाते रहने की सलाह भी, जो एक तरह से हिदायत भी थी.”
“पापा जी ने अपने गांव में देखा था कि पढ़ाई के बाद ऊंची जाति के लोग सब कुछ हासिल कर सकते थे, इसलिए आर्थिक तंगी होते हुए भी उन्होंने मुझे खूब पढ़ाने का फैसला किया.” मन-ही-मन उसने अपने पापा जी की इस समझदारी और दरियादिली को नमन किया.
“फिर तो दसवीं के बाद मैंने अपने इलाके के बच्चों को ट्यूशन पढ़ाना शुरू कर दिया और एक-एक क्लास करके मैंने JNU से MA, M.PhiL की डिग्री लेकर PhD जमा कराई और अब मुझे अमेरिका में दोबारा PhD करने और वहां पढ़ाने का मौका मिला है.” उसकी खुशी का पारावार न था.
तभी मां की आवाज से उसकी तंद्रा टूटी. “सरिता, देख तो माइक और कैमरा लेकर कौन लोग तुझसे मिलने आए हैं?”
झोपड़पट्टी से अमेरिका के फेलोशिप की खबर आग की तरह सारे शहर में फैल चुकी थी. पत्रकारों के झमघट को तो आना ही था.