गीत/नवगीत

नज़्म

तुम्हें हरदम पुकारा है,
मैंने खामोश होकर भी,
तुम्हें इक पल नहीं भूला,
मैं अपने होश खोकर भी,
तुम्हें धड़कन बना कर मैं,
दिल में अपने बसा लूँगा,
कुछ ना कर सकोगे तुम,
तुम्हें तुम से चुरा लूँगा,

तेरे ही दम से मेरी जां,
ये दुनिया खूबसूरत है,
तुझे मालूम क्या मुझको,
तेरी कितनी ज़रूरत है,
मैं दुनिया छोड़कर सारी,
तुम्हें अपना बना लूँगा,
कुछ ना कर सकोगे तुम,
तुम्हें तुम से चुरा लूँगा,

दिल-ए-नाज़ुक है सीने में,
और तेरे शहर में हूँ,
मौत मेरा मुकद्दर है,
मैं कातिल की नज़र में हूँ,
मगर मरते हुए भी मैं,
गीत जीवन के गा लूँगा,
कुछ ना कर सकोगे तुम,
तुम्हें तुम से चुरा लूँगा,

तेरी आँखों के मयखाने में,
अक्सर डूब जाता हूँ,
मदहोशी का आलम है,
पिए बिन लड़खड़ाता हूँ,
तेरी उल्फत के पैमाने,
मैं होंठों से लगा लूँगा,
कुछ ना कर सकोगे तुम,
तुम्हें तुम से चुरा लूँगा,

हाल-ए-दिल बता देना,
मुहब्बत में इशारों से,
तुझे पैगाम भेजूंगा,
सितारों से, बहारों से,
छुपे तू लाख पर्दों में,
मैं चंदा से पता लूँगा,
कुछ ना कर सकोगे तुम,
तुम्हें तुम से चुरा लूँगा,

— भरत मल्होत्रा