सामाजिक

माता-पिता बच्चों में नैतिकता और अपनापन विकसित करें

संसार के प्रत्येक माता-पिता चाहते हैं कि उनकी संतान सभ्य एवं सुसंस्कृत बने और परिवार व समाज में उनके सम्मान का कारण बने लेकिन बहुत से माता-पिताकी ये इच्छा केवल एक स्वप्न बनकर रह जाती है, मनोनुकूल संतान न बन पाने के कारण माता-पिता की वृद्धावस्था दुखपूर्ण और अतृप्त व्यतीत होती है इस समस्या के निराकरण के लिए क्या होना चाहिए ?  ऐसा क्या किया जाये की बच्चों में नैतिकता और अपनापन विकसित हो सके साथ ही साथ वह हमारे विचारों से भी जुड़ें ?

देखा जाए तो इस समस्या का समाधान स्वयं माता-पिता के बच्चे के प्रति व्यवहार में ही छुपा हुआ है। यदि माता-पिता बच्चे के प्रति  कठोर अथवा असंतुलित व्यवहार रखेंगे और बच्चों के मनोभावों को न समझते हुए केवल अपने आदेशों का पालन करायेंगे तो बात बनने वाली नहीं है, अपितु कुछ समय तक आपकी आज्ञा मानने वाला बच्चा किशोरावस्था तक आते-आते बाग़ियों जैसा व्यवहार करने लगेगा उसकी कुंठा उसे घोर निराशा की ओर ले जाएगी।

ख़ासकर माता-पिता के ऊपर बच्चों में अच्छी आदतें डालने उन्हें सुयोग्य बनाने का महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व है आप उसे जिस ढांचे में ढालना चाहते हैं ढाल सकते हैं क्योंकि उसके मनोभावों को आप जितना जानते हैं उतना उसका शिक्षक नहीं जानता शिक्षक बच्चे में नए विचार रूपी बीज आरोपित कर सकता है लेकिन उन विचारों का संवर्धन  करने उन्हें एक विशाल वृक्ष के रूप में स्थापित करने का कार्य माता-पिता का ही होता है और सभी माँ-बाप यह चाहते भी हैं कि उनके बच्चे योग्य बनें ।

किंतु बच्चों का निर्माण कैसे हो हम उनमें संस्कारों और मानवोचित व्यवहार के गुण किस प्रकार विकसित करें यह एक पेचीदा प्रश्न है।

इसके लिए माता-पिता में परिपक्व विचारशीलता, विवेक, संजीदगी एवं थोड़ी बहुत बाल-मनोविज्ञान की समझ होना आवश्यक है। बहुत से माता-पिता तो बच्चों को पैदा करने, खिलाने-पिलाने, स्कूल आदि में पढ़ने की व्यवस्था तक ही अपने उत्तरदायित्व की इतिश्री समझते हैं| इससे बच्चों के निर्माण की संपूर्ण समस्या का हल नहीं होता। बच्चों में अच्छी आदतें डालना उनमें सद्गुणों की वृद्धि करके सुयोग्य बनाना एक महत्वपूर्ण कार्य है।

यह असुरता से देवत्व उत्पन्न करने पशुत्व को मनुष्यता में बदलने की प्रक्रिया है। बच्चों को प्यार करना खिलाना, पिलाना, उसका संरक्षण करना तो पशुओं में भी पाया जाता है। बच्चों में बढ़ती हुई अनुशासनहीनता, चिड़चिड़ाहट, स्वेच्छाचार एवं अन्य बुराइयों की जिम्मेदारी बहुत कुछ माता-पिता के ऊपर ही होती है क्योंकि बच्चा दिनभर का एक लंबा समय माता-पिता के साथ उनके द्वारा घर-परिवार में बनाए गए वातावरण में ही बिताता है तो जो कुछ भी बच्चे की आदतें और विचार होते हैं उनमें से बच्चे में 80 प्रतिशत क्रियाकलाप,आचार-विचार,व्यवहारमाता-पिता और परिवार के द्वारा बनाए गए माहौल से ही आए होते हैं।

विद्यालय में जो कुछ बच्चा सीखता है वो किसी गमले में बीज बोने तक की क्रिया मात्र है उस बीज का संरक्षण करना उसे उसके अनुकूल वातावरण प्रदान करना गमले के मालिक का काम है। यदि उस बीज की देखभाल व्यवस्थित रूप और सावधानीपूर्वक न हो तो वह स्वतः ही नष्ट हो जाएगा।

परिवार या माता-पिता की सामान्य-सी गलतियों, व्यवहार की छोटी-सी भूलों के कारण बच्चों में बड़ी-बड़ी बुराइयां पैदा हो जाती हैं और अनेक बुरी आदतें बच्चों में पड़ जाती हैं। स्वयं मां-बाप जो कुछ भी कह सुन रहे होते हैं तथा वह जिसे सुधार समझते हैं वही बात बच्चों के बिगड़ने का कारण बन जाती है। अतः बच्चों के प्रति संतुलित व्यवहार होना आवश्यक है जिसमें कुछ आप बच्चों की सुनें और कुछ बच्चे आप की सुनें, कुछ आप बच्चों की मानें  और कुछ बच्चे आपकी मानें यदि यह संतुलित क्रम चलता रहे तो निश्चित ही अच्छे परिणाम आ सकते हैं।

अपने बच्चों को भावनात्मक रूप से जोड़ें उन्हें अपने जीवन में उनकी अहमियत अनुभव कराएं और केवल उनके माता-पिता ही न बने रहें बल्कि धीरे-धीरे उनके मित्र बनते जाए।

बच्चे के व्यक्तित्व की सर्वांगीण उन्नति के लिए उचित वातावरण और आवश्यक परिस्थितियाँ पैदा करना माता-पिता का सर्वोच्च कर्तव्य है क्योंकि बच्चों में जन्म से ही कुछ गुण-अवगुण विद्यमान होते हैं उसी के अनुसार उनका व्यक्तित्व ढलता जाता है । बालक सबसे पहले घर के वातावरण से प्रभावित होता है ।

घर एक प्राथमिक पाठशाला होती है जिसमें माता-पिता बच्चों के गुरु होते हैं । अपने माता-पिता  के जीवन का बालक पर बहुत गहरा असर पड़ता है । यदि माता-पिता का गृहस्थ जीवन सुखी नहीं है तो बच्चा कभी भी सुखी नहीं रह सकता है । यदि घर में हमेशा कलह-क्लेश मची रहती है, माता-पिता की आपस में अनबन रहती है तो बालक पर इसका गलत प्रभाव पड़ता है और वह अपने भावी सामाजिक जीवन में असफल रहता है । आपस में लड़ने-झगड़ने वाले माता-पिता बालक को एक अच्छा नागरिक नहीं बना सकते । अतः बच्चों को समाज का उत्तम नागरिक बनाने के लिए माता-पिता को उत्तम माता-पिता बनना चाहिए । क्योंकि जैसा बीज बोयेंगे वैसा ही फल पैदा होगा ।

पंकज कुमार शर्मा ‘प्रखर’

लेखक एवं विचारक

कोटा, राज.