कविता

हाय हाय री मजबूरी

घर से निकला
गर्मी में चंद कदम चल
मैं तो वापस लौट आया
हाय हाय मजबूरी
कपड़ा और रोटी
की जद्दोजहद में
मजदूर को देखा
पसीना बहाते
नंगे सिर
ईंट सीमेंट ढोते
वह कैसे लौट जाता
डर कर इन लू के थपेड़ों से
वह भी अगर डर जाय
तो कैसे जले रात को उसके घर चूल्हा