लघुकथा

सफाई

“ममा, मैं कितनी भी कोशिश करूं मेरा मन शांत नहीं रहता, मैं क्या करूं?” व्यथित मानसी बोली.
“सफाई.”
“मन शांत रखने से सफाई का क्या ताल्लुक है?” मानसी के स्वर में तनिक तलखी थी.
“मन में कूड़ा-कचरा भरा होगा, तो मन बचैन ही रहेगा न, कैसे शांत रहेगा? और सबसे पहले मन की, बोलने की इस तलखी को छोड़ो.” ममा ने समझाया.
“मुझे तो आपकी बात जरा भी समझ नहीं आ रही, बात को कहां-से-कहां ले जाती हैं?” तलखी गुस्सा बनती जा रही थी.
“मानसी, तुम्हें पता है न आजकल हमारा गैस लाइटर खराब हो गया है?”
“लो, अब गैस लाइटर बीच में कहां से आ गया?” युवा होती मानसी अपनी पीढ़ी का प्रतिनिधित्व कर रही थी.
“तुम देखती हो न, कि मैं जब गैस लाइटर की अंदर से सफाई करती हूं तो यह चुपचाप सही होकर काम करने लग जाता है!”
“तो!”
“यही तो हमारे साथ होता है! जब हम किसी से चीटिंग करते हैं या दिखावा करने के लिए काम करते हैं, तो हमारा मन कड़वा-सा होकर हमें कचोटने लग जाता है और हर समय अशांत रहने लगता है.”
मानसी से कुछ कहते नहीं बना.
“मैं भी तो इधर-उधर से कॉपी कर, कुछ अपना जोड़कर वाहवाही लेती रहती हूं! छल-कपट से भी मुक्त तो नहीं हूं न! सफाई तो करनी ही पड़ेगी!” आज पहली बार मानसी का मन उसे कचोटने लगा.