कविता

चलो गाँव की ओर

चलो गाँव की ओर
शहर में है बहुत शोर
प्रदुषण की हो रही प्रहार
नहीं मिलता है शुद्ध बयार
चलो गाँव की और
शहर ने कर दिया बोर
जिन्दगी कैद है दीवारों में
संसार सिमट गई घर द्वारों में
चलो गाँव की ओर
गाँव बुला रही है चहुँओर
शुद्ध जल व शुद्ध बयार
सारा गाँव है अपना संसार
चलो गाँव की ओर
ना है जहाँ तनिक भी शोर
शीतल छाया पीपल की
रोशनी जगमग दीपक की
चलो गाँव की ओर
सुरक्षित है जहॉ पे ठौर
मवाली ना है राहों में
सब मशगुल है अपने कामों में

— उदय किशोर साह