लघुकथा

एकता का परचम

“कहां ग़ुम थे तुम इतने दिन!” सोमेश ने प्यार से सामने से आते हुए हुसैन के गले से लगते हुए कहा.
“तुम भी तो इतने दिन नज़र नहीं आए!” हुसैन की आंखों से आंसुओं का सैलाब उमड़ आया था.
“नफ़रतों की आंधियों में
बड़े-बड़े दरख़्त ढह जाते हैं,
हमारी-तुम्हारी क्या बिसात!–”
सोमेश की पकड़ कसती जा रही थी.
सच कह रहे हो-
“ईर्ष्या के सैलाब में
न जाने कितनी कश्तियां डूब जाती हैं.–”
हुसैन में भी अलग होने की जुंबिश नज़र नहीं आ रही थी.
“अब फिर न डूबने देना दोस्ती की कश्तियों को, वरना हमारा वजूद ही ख़तरे में आ जाएगा.” सोमेश ने हुसैन की आंखों से आंखें मिलाते हुए गुज़ारिश की
“सही कह रहे हो, दुनिया में हमारी दोस्ती मिसाल बन गई थी.” हुसैन ने क़बूलियत की मुहर लगा दी.
“अब भी हम एक हैं और एक रहेंगे.” सोमेश ने अपने हाथ में हुसैन के हाथ को थाम लिया.
एकता का परचम बुलंद था.

One thought on “एकता का परचम

  1. ‘एकता में शक्ति है’ यह कहावत विस्तृत रूप से इस्तेमाल किया जाता है, जिसका मतलब है कि जब लोगों का समूह एकजुट रहता है, तब वे उस व्यक्ति की तुलना में अधिक मजबूत रहते हैं जो वे व्यक्तिगत रहे होंगे। इस कहावत की खासियत ये है कि यह केवल इंसानों पर ही नहीं बल्कि अन्य जीव-जंतुओं पर भी बराबर से लागू होता है। ‘एकता में शक्ति है’ ये कहावत यह सन्देश देती है कि ताकत एकता से ही आती है, जैसे कि मुश्किल वक़्त में जब लोग एक साथ खड़े रहते हैं, वे ज्यादा मजबूत होते हैं और कई तरह की परेशानियों का आसानी से सामना कर सकते हैं।

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