कुण्डली/छंद

कुण्डलिया छंद

चोरी नैनों से करे, लूटे मन का चैन।
जब तब पलके मूंद कर, दिन को कर दे रैन ।।
दिन को कर दे रैन , पिया की है छवि प्यारी ।
मनमोहे मनमीत, और मैं मन से हारी ।।
कहे साधना बात , प्रीत की है जो डोरी।
बाँधे तोड़े आज, हृदय की कर के चोरी ।।
— साधना सिंह