लघुकथा

बंटवारा

अचानक फोन की घंटी बजने से माधवी चौंक गई ;  फोन देखा तो कामिनी का था ! कामिनी मेरी छोटी भाभी है।
“दीदी पापा गांव गए हैं”
“किस लिए “मैंने चौंकते हुए पूछा
“बंटवारा कराने “
“साथ में और कौन गया है “
“कोई भी नहीं , जाने अब क्या होगा”
उसकी बातों में चिंता झलक रही थी, चिंता नाहक न थी।
हम सभी यह अच्छी तरह जानते है कि ताऊजी और चाचा के सामने पापा की कुछ भी नहीं चलती. बड़ी आसानी से दोनों भाई पापा को बेवकूफ बना लेते और पापा है कि हमेशा उनकी बातों में आकर अपना नुकसान कर लेते हैं। इस बार अकेले गए हैं कुछ -कुछ गड़बड़ करेंगे । पिछले बार गए थे तो ताऊजी ने तो बड़ी चालाकी से पापा की खरीदी जमीन को अपने नाम करवा लिया था।
बचपन से आज तक कभी याद नहीं कि चाचाजी और ताऊजी ने पापा को गांव की खेती -बाड़ी से कुछ दिया है हमेशा उनसे किसी -न-किसी बहाने से लिया ही है, कभी दादी के नाम पर, तो कभी अपने बच्चों के पढ़ाई के नाम पर, तो कभी गांव के घर की मरम्मत के बहाने। पापा है कि अपने भाइयों की चालबाजी समझ ही नहीं पाते।
इस बार भी ऐसा ही कुछ होगा जिम्मेवारी सारी पापा की फायदा सारा उनका। मुझे समझ में नहीं आता यह किस तरह का बंटवारा जिसमें जिम्मेदारी सिर्फ एक की और  अधिकार दूसरे का…?
— विभा कुमारी “नीरजा”

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