लघुकथा

टीम भावना

कोई भी खेल हो, कोई जीतता है कोई हारता है.
क्रिकेट भी ऐसा ही खेल है. इसमें दो विरोधी टीमें होती हैं, कोई हारता है, कोई जीतता है, कभी-कभी खेल अनिर्णीत (ड्रा) या बराबरी (टाई) हो जाता है.
विजयनगर की दो टीमें मैदान पर उतरतीं. विजय टीम और पराजय टीम. नाम से क्या होता है? मजबूत होने के बावजूद अक्सर विजय टीम हार जाती और कमजोर होने पर भी पराजय टीम की जीत हो जाती.
हार जाने पर विजय टीम को दुःख भी होता, खिलाड़ी मंथन भी करते, कोच उन्हें जीतने के गुर समझाते भी, नतीजा वही ढाक के तीन पात!
“टीम भावना से खेलो.” कोच समझाते. एकता में ही शक्ति है की वो कहानी भी याद दिलाते जिसमें एक अकेली लकड़ी को हर कोई तोड़ देता है, पर लकड़ी के गट्ठर को तोड़ना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी हो जाता है.
कबूतर वाली कहानी भी सुनाते कि किस तरह बहुत-से कबूतर मिलकर जाल को उड़ा ले जाते.
चार दोस्त सांडों की एकता की कहानी भी पता नहीं कितनी बार सुना चुके थे, जिसे एक लोमड़ी की चालाकी ने तोड़ दिया था और शेर एक-एक कर सबको खा गया.
दो बिल्लियों और बंदर बांट की कहानी भी छूटी नहीं.
सब समझ भी जाते, पर खेलते समय न जाने क्यों सबको अपनी-अपनी प्रशंसा बटोरने की ही चिंता होती, टीम की नहीं. नतीजा- माया मिली न राम!
सोच-समझकर कोच ने उनको एक फिल्म दिखाई, सबके मन में यह भावना घर कर गई कि “अकेले शेर को लकड़बग्घों ने नोचा, बाद में बाकी शेरों ने मिलकर जो किया उसे टीम भावना कहते हैं.”
“वैसे भी बंधी मुट्ठी लाख की, खुली तो प्यारे खाक की!” कप्तान ने निष्कर्ष निकाला.
समझने के लिए शायद वह पल अनुकूल था! बंधी मुट्ठी ने टीम भावना को बलवती कर दिया था. विजय टीम अब जीत का लक्ष्य लेकर उतरी थी, टीम भावना का संबल जो उनके साथ था!