कविता

बरसो रे मेघा

मेघा नभ पे आया मतवाला
खोल दिया बादल का  ताला
उमड़ घुमड़ बदरा   इतराये
गगन से बुदें जल    बरसाये

आसमान पे घनघोर घटायें छाई
बिजली कड़की घूंघट में शरमाई
गर्जन कर फिर शोर मचा डराया
झूमा सावन अब जल बरसाया

दादुर संग संग झींगुर भी     गाये
लता बृक्ष पर है ढोल       बजाये
वन उपवन तब झूम के है नाचा
तन मन में नई उल्लास तब जागा

खेत बहियार कल तक था प्यासा
तृप्त हुई सब मन की अभिलाषा
जंगल में मोर चुनरी ओढ़ दिखलाये
तपती धरती तब प्पास     बुझाये

मेघा खुशी से जल धरा पे बरसाया
रात घनघोर तम चादर बिछा आया
दीपक की लौ थक कर सो जाये
सिरहन डर की मन को है डराये

पूवाई हवा जब जब चली आई
दस्तक दरवाजे पे दे       जाती
कितना पावन है ये      सावन
बरखा की है नित्य आवन जावन

— उदय किशोर साह