मुक्तक/दोहा

मुक्तक

भरा हुआ है नीर नयन में, किसे दिखाऊँ,
मन की पीड़ा बहुत घनी, किसे सुनाऊँ?
लिये जिस्म की चाहत, सब घूम रहे हैं,
प्यार वफ़ा की बातें बोलो, किसे बताऊँ?
किया समर्पण, नहीं कभी धर्म को देखा,
आशिक की आँखों में, सपनों को देखा।
राधा से मैं बनी राबिया, जिसकी ख़ातिर,
अटैची औ’ फ्रिज में, खुद को सड़ते देखा।
दे कर तलाक़, दोस्त से हलाला करवाया,
पुनः निकाह, रोज़ रोज़ मुझको तडफाया।
रिश्ते नाते सभी छोड़, जिसके साथ रही,
देकर जान वफ़ा निभाई, बेवफ़ा बताया।
नहीं सुनी थी बात पिता की, न कहना माँ का माना,
अधिकारों का रौब जमाया, आधुनिकता का गहना।
संविधान की दे कर दुहाई, दक़ियानूसी सोच बताई,
सँभल सको तो संभलो अब भी, और नहीं कुछ कहना।
— अ कीर्ति वर्द्धन