स्वास्थ्य

पेट दर्द को नज़र अंदाज़ ना करे

अपने 42 वर्ष के चिकित्सक के रूप में कार्य करते हुए बहुत से ऐसे मरीज़ो से सामना हुआ है जो शरीर के किसी भी अंग में दर्द को आकस्मिक तरीके से लेते है, फिर चाहे वह सर दर्द हो या पेट दर्द। अधिकांश मरीज़ो में हल्का सर और पेट दर्द बिना किसी चिकित्सक के नुस्खे से किसी भी दवा विक्रेता से सरलता से मिल जाती है और मरीज़ कुछ ही देर में ठीक हो जाता है।

तो साहिब आज बात करते है पेट दर्द के बारे मे। हमारे शरीर के कई अंग पेट यानी एब्डोमेन के वो हिस्से में होते है जो छाती के नीचे तथा प्राइवेट पार्ट के ऊपर होते है। इसमें मुख्य अंग पेट ( स्टमक ) छोटी व बड़ी आंत, कोलन, लिवर तथा पित्ताशय ( गॉल ब्लैडर ), किडनी, तिल्ली ( स्प्लीन ) , मूत्रवाहिनी और मूत्राशय, पुरषों में पौरुष ग्रंथि ( प्रोस्टेट ) तथा महिलाओं में ओवरीज और गर्भाशय है। इनमे किसी भी अंग में सूजन, संक्रमण, अथवा कई अंगो में पथरी या रसोली हो तो दर्द हो सकता है।

अन्य कारणों में अपेंडिक्स में सोजिश यानी अप्पेंदिसिटिस, गैस, एसिडिटी और कब्ज़ भी हो सकती।

अधिकाँश मरीज़ इसे गैस या एसिडिटी समझ कर दवाई ले लेते है पर हो सकता है की अगर पेट दर्द या गैस की शिकायत पेट के ऊपरी हिस्से में हो तो वह किसी हृदये घात का संकेत हो।

कब दर्द होता है, कैसा दर्द है, कही दर्द फ़ैल रहा है क्या, ऐसे कई सवाल एक कुशल चिकित्सक द्वारा पूछने पर और पेट का निरीक्षण तथा कई बार खून, पेशाब तथा मल की जांच तथा पेट के स्कैन करने पर ही पता चलता है। बहुत बार तो पहली जांच में सही डायग्नोसिस यानी की कौन सी बीमारी है पर पहुंचना चिकित्सक के लिए चुनौती पूर्ण हो जाता है। तभी तो पेट यानी एब्डोमेन को एमबीबीएस के पाठ्यक्रम की एक सर्जरी की पुस्तक में ‘ पैंडोरा’स बॉक्स,’ यानी भानुमती का पटारा कहा गया है।

अब मिसाल के तौर पर राकेश ( ( बदला हुआ नाम ) की मिसाल लीजिये। सुबह के वक़्त देर से उठने के कारण वह हफडा दफ़्ती में तैयार होकर निकलने वाला है तो पत्नी रचना आवाज़ देकर कहती है , ‘ सुनो जी, आप ने कुछ खाया नहीं। कुछ तो खा लो, नाश्ता तैयार है। ‘

‘ नहीं नहीं, देर हो रही है, दफ्तर में ही खा लूँगा, ‘ राकेश कहता हुआ, तेज़ी से निकलता है।

दफ्तर पहुंच कर वो ऐसा काम में उलझता है कि उसे खाने का होश ही नहीं रहता। वह चाय पीकर गुज़ारा करता है। दोपहर के वक़्त भी बाजार से बर्गर मंगवा कर खा लिया।

दफ्तर में काम इतना की रात को 10 बजे घर पहुँचता है तो रोज़ कि तरह अपनी थकान मिटाने के लिए उसने दो पेग शराब पिए और खाना खा कर
सो गया।

राकेश का यह रोज़ की दिनचर्या है।

एक दिन उसे पेट में दर्द हुआ। उसने एक पेट के दर्द की गली खाई। उसे कुछ आराम मिला, पर रात को जब बहुत तीव्र दर्द उठा तो वो हॉस्पिटल के पास इमरजेंसी में दिखाने गया। उसे दर्द की पीड़ा के लिए तत्काल एक इंजेक्शन लगा दिया और सुबह कुछ टेस्ट के लिए बोल दिया और घर वापिस भेज दिया।

राकेश को आराम मिला और उसने प्रशिक्षण नहीं कराये। पत्नी ने जब उसे कहा तो वो बोला, ‘ अरे भाई, अब ठीक हूँ, अभी काम बहुत है, जब फ्री हूँगा, करवा लूँगा। ‘

पर राकेश कभी फ्री हुआ ही नहीं। पेट में कभी कभी दर्द होता तो वह पेनकिलर खा लेता।

फिर एक दिन वही तीव्र दर्द जब हुआ और वह हॉस्पिटल गया तो उसे दाखिल कर लिया। अन्य प्रशिक्षण में पेट का सिटी स्कैन हुआ। पेट की आंत में एक अलसर था जो फैट गया था ।

15 दिन वह हॉस्पिटल में रहा।

डॉक्टर्स ने कहा की यह आप की ‘ अनयंत्रित जीवनशैली के कारण हुआ। ‘

अनयंत्रित जीवनशैली से उसने समझ लिया की सुबह खाली पेट दफ्तर नहीं जाना चाहिए और खाना समय पर खाना चाहिए।

राकेश इस अनयंत्रित जीवनशैली का अकेला शिकार नहीं है, जिसे कोई ऐसा गंभीर रोग हो गया, ऐसे कई लोग है जो देर सवेर गंभीर बिमारियों का शिकार हो जाते है। अक्सर बच्चे स्कूल और दफ्तर जाने वाले पुरुष और महिलाएं खाली पेट जाते है और उनके खाने पीने का समय ही नहीं होता।

माँ का यह फ़र्ज़ होता है की वह बच्चो को स्कूल भेजने से पहले कुछ खाने और कम से कम एक गिलास दूध तो दे ताकि उनको सुबह इस से स्कूल में पड़े के लिए ऊर्जा मिले।

सुबह का नास्ता, दोपहर का खाना और रात का खाना समय पर ले और बीच के अगर भूख लगे तो कोई फल या हल्का स्नैक ले सकते है।

बार बार जब पेट दर्द हो तो इस संकेत को कभी हलके में न ले, ऐसा करना शरीर के लिए हानीकारक हो सकता है।

-डॉक्टर अश्वनी कुमार मल्होत्रा

डॉ. अश्वनी कुमार मल्होत्रा

मेरी आयु 66 वर्ष है । मैंने 1980 में रांची यूनीवर्सिटी से एमबीबीएस किया। एक साल की नौकरी के बाद मैंने कुछ निजी अस्पतालों में इमरजेंसी मेडिकल ऑफिसर के रूप में काम किया। 1983 में मैंने पंजाब सिविल मेडिकल सर्विसेज में बतौर मेडिकल ऑफिसर ज्वाइन किया और 2012 में सीनियर मेडिकल ऑफिसर के पद से रिटायर हुआ। रिटायरमेंट के बाद मैनें लुधियाना के ओसवाल अस्पताल में और बाद में एक वृद्धाश्रम में काम किया। मैं विभिन्न प्रकाशनों के लिए अंग्रेजी और हिंदी में लेख लिख रहा हूं, जैसे द इंडियन एक्सप्रेस, द हिंदुस्तान टाइम्स, डेली पोस्ट, टाइम्स ऑफ इंडिया, वॉवन'स एरा ,अलाइव और दैनिक जागरण। मेरे अन्य शौक हैं पढ़ना, संगीत, पर्यटन और डाक टिकट तथा सिक्के और नोटों का संग्रह । अब मैं एक सेवानिवृत्त जीवन जी रहा हूं और लुधियाना में अपनी पत्नी के साथ रह रहा हूं। हमारी दो बेटियों की शादी हो चुकी है।