कविता

भोर

भोर हुई चिड़ियों ने गाया गाना
बिखर गया चहुं ओर उजाला
नव उमंग से मोर नाचते
नई -नवेली कलियों पर भंवरे मंडराते ।
पूरब में सूरज खड़े लिए धूप का रथ
देखो हुआ अंधेरा सारा छू-मंतर
पेड़ों की डालों पर फुदक रही गोरैया
छत पर दाना बिखराता है रामू भैया ।
सारे जग को रोशन करता सूरज एक
ठीक समय पर आकर रोज जगाता
हमसे बदले में कुछ नहीं पाता
फिर भी धूप सुनहरी हमको दे जाता ।
सूरज के स्वागत में जल्दी उठ जायें,
झटपट अपनी दिनचर्या पूर्ण कर जायें
नव किरणों के साथ नव किरणों सा मुसकायें,
मत करना आना-कानी, इसी तरह रोज जग जायें ।
— मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

नाम - मुकेश कुमार ऋषि वर्मा एम.ए., आई.डी.जी. बाॅम्बे सहित अन्य 5 प्रमाणपत्रीय कोर्स पत्रकारिता- आर्यावर्त केसरी, एकलव्य मानव संदेश सदस्य- मीडिया फोरम आॅफ इंडिया सहित 4 अन्य सामाजिक संगठनों में सदस्य अभिनय- कई क्षेत्रीय फिल्मों व अलबमों में प्रकाशन- दो लघु काव्य पुस्तिकायें व देशभर में हजारों रचनायें प्रकाशित मुख्य आजीविका- कृषि, मजदूरी, कम्यूनिकेशन शाॅप पता- गाँव रिहावली, फतेहाबाद, आगरा-283111