मुक्तक/दोहा

दो मुक्‍तक नव सम्‍वत्‍सर पर

1 ज्ञान ध्यान दे सुसंज्ञान दे, शक्ति-भक्ति का विधि-विधान दे. माया, साया संग निरोगी काया दे पर नि‍रभिमान दे. वंश-वृद्धि और सुख-समृद्धि दे ऋद्धि-सिद्धि में दे अभिवृद्धि, मय सद्भाव प्रेम-प्रीति यह नव सम्वत्‍सर ससम्मान दे. 2 मत देना प्रभु ऐसा अभाव मैं पालूँ मत्सर का स्वभाव. विद्वेष मोह माया का न पालूँ हाव-भाव न मनोभाव. […]

गीतिका/ग़ज़ल

हर आदमी

हो गया क्‍यों अजनबी हर आदमी. सो गया क्‍यों मजहबी हर आदमी. वह पढ़ा है वह गुना है देश में, नहीं’ बना क्यों मकतबी हर आदमी. खूब धन दौलत कमा के बावला, बन गया क्‍यों मतलबी हर आदमी. आँख हैं आकाश पर अब जीत के, हो गया क्‍यों मनसबी हर आदमी. नाम ‘आकुल’ का जुड़ा […]

गीतिका/ग़ज़ल

अगर तुम दो कदम भी साथ आओ तो

  अगर तुम दो क़दम भी साथ आओ तो, अगर तुम हमसफ़र बन कर बताओ तो. सफ़र की मुश्किलें आसान कर दोगी, अगर तुम हाथ अपने भी बढ़ाओ तो. खिलेंगे फूल तुम जो हाथ धर दोगी, अगर तुम बाग़बाँ बन कर खिलाओ तो. अमावस में चँदनिया रात कर दोगी, अगर तुम चाँद बन कर घर […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल : होली खेलें

होली खेलें पर नहीं डालें रंग किसी अनजान पर. मिलें प्रेम से रंग लगायें घर आए मेहमान पर. बच्चों के हिस्‍से में ही रहने दें, बस गीली होली, गीली होली से क्‍यों किसी का रंग फिरे अरमान पर. रँग चोखा हो, नहीं’ धोखा हो, गहरे रंगों से बच कर, खेलें होली सब हमजोली अपने हीं […]

मुक्तक/दोहा

होली पर मुक्‍तक

रंग इंद्रधनुष सा जीवन का हो रहन-सहन और ढंग. बैरभाव कटुता की न कोई भरी हुई हो भंग मन उमंग से भरे रँगे हो धरती और आकाश, रंगों में दिखलाई दे अपनी संस्कृति का रंग.  बदरंग रंगों में हो रँगे हुए, चहुँ ओर दिखे उल्लास. उड़े हुए हों रँग न कहीं न चेहरे दिखें उदास. […]

गीतिका/ग़ज़ल

फुलवारी है नारी

पदांत- है नारी समांत- आरी इस जगती में सबसे ही न्यारी है नारी. इस धरती की प्यारी फुलवारी है नारी. यह निसर्ग उपवन कानन से महका करता, महकाती घर जन्‍म से’ बलिहारी है नारी. सौरभ से वंचित उपवन भी श्री विहीन है, श्री विहीन है घर यदि दुखियारी है नारी. जैसे मगन मयूरी नाचे कोयल […]

गीत/नवगीत

मनुष्‍य ही है जो कभी रुका नहीं

मनुष्‍य ही है जो कभी रुका नहीं. पर्वत रुक गये आगे बढ़े नहीं समुंदर भी आसमान चढ़े नहीं हवाएँ भी ऊपर जा ठहर गईं मौसमों ने मंसूबे गढ़े नहीं मनुष्‍य ही है जो कभी थका नहीं. सितारे, चाँद सूरज भी झुके हैं सुबह’-शाम की आगोश में छुपे हैं नदिया आखिर सागर में समाई वर्तमान भूतकाल […]

गीतिका/ग़ज़ल

मनुष्य

पदांत- है समांत- आन ज्ञान में सम्मान्य है, वागीश्वरी वरदान है. ज्ञान में सब प्राणियों में मनुष्य ही प्रधान है. विद्वान् है, गुणवान् है, महान् है कला में वह, प्राणिजगत् में मनुष्य ही इस धरा की शान है. भविष्य की उड़ान है, है वर्तमान बहु उर्जित, पंचतत्व निर्मित नियति निर्दिष्ट वह विज्ञान है. वाक्-पटुता में […]

कविता

आेह ! ऋतुराज

ओह ! ऋतुराज न करना संशय आना ही है. तुझको दूषित प्रकृति पर विजय पाना ही है. धरा प्रदूषण का हलाहल पिए है मौन. जन जीवन को संरक्षण तब देगा कौन. ग्रीष्‍म शरद बरखा ने सदा कहर बरपाया. देख रहे अब शीत शिशिर का रूप पराया. तुम भी कहीं सोच बैठे हो साथ न दोगे. […]

गीत/नवगीत

फिर आया नववर्ष

फिर आया नववर्ष भूल जाओ जो बीता. धूल झाड़ के ख्वाबों को बाहों में भर लो. हरे-भरे बागानों को राहों में कर लो. काँटों को भी साथ रखो अभिमान न आए, राख हटा अंगारों को दामन में भर लो. रुका कहाँ है समय चलता रहा जो जीता. फिर अवसर आएगा ढूँढो ये अथाह है. इतिहास […]