गीतिका/ग़ज़ल

गजल

नविक की भी जिम्मेदारी होती है सागर से जंग जो जारी रहती है नकुसान बहुत पहुंचते हैं यहां अपने लोग यही सोच में तबीयत भारी रहती है अपने मुंह को बना लेते हैं सुनकर वो जब भी सामने उनके बात हमारी रहती है

कविता

कविता सचमुच बसंत है

क्या सचमुच बसंत है जिसमें नहीं दिखते हैं पेड़ जिनमें था कुछ पंक्षियो का घरौंदा। जिसमें रहते थे कुछ बच्चे जिनसे छीन लिया गया जीवन उनका और देखने वाले देखते रहे — अभिषेक जैन  

कविता

कविता

क्या तुम्हें कोई दुःख नहीं होता। जनता को दुखी देखकर कि जिम्मेदारी कुछ तो बनती है तुम्हारी भी जो तुमने वादे किए थे चुनाव के समय उनसे वहीं वादे सड़क बिजली और खाना जो अभी तक मिला नहीं है शायद जुमला था वो जिसको जीतकर भूलने वाले भूल जाते है

गीतिका/ग़ज़ल

गजल

दुःख जिसके ज़माने के अदंर है वो ही तो भोले शंकर है आये कैसे बहार उसमें जिसकी ये ज़मीं ही बंजर है देख ले बिछड़कर नहीं मरा हूं मैं अब ये हालात कितने बेहतर है। थोड़े में ही भर ही आते हैं। मेरे आंसू ही अब समंदर है

कविता

कविता

दुखो के बीच जीने की चाह पैदा कर रहा हूं मैं खुद को ऐसा बना रहा हूं कि मुझे जिंदगी जीने में कोई तकलीफ़ न हो और वो भी दुःखी न हो जिनका मुझसे कोई रिश्ता हो क्योंकि अपनों को दुःख देना बुरी बात है और ऐसी बातों को होने से रोया जाएं तो अच्छा […]

कविता

काविता

अपनी बारी का इंतजार था मगर वो बारी आई नहीं उसका इंतजार आज तक है मैं खुद को कैसे हारा मानूं क्योंकि मुझे अपने हुनर दिखाने मौका ही नहीं मिला बिना खेले तो कोई बाजी नहीं हारी जाती जीत गए तुम कैसे मैं तो अभी बाकी हूं इक पल में पारिणाम बदल सकता हूं जो […]

गीतिका/ग़ज़ल

गजल

सफर थोड़ा है अब आराम चाहता है। अब मुसाफिर अपना धाम चाहता है। कभी करो और भी मेहनत और भी तुम अभी इसे क्या तू भी नाम चाहता है। आगज शानदार गुजरा था वै सा ही वो अपना मुकाम का अंजाम चाहता है। कोई पुरानी शय नहीं मौजूद जिसमे अगर नया साल है तो नई […]

गीतिका/ग़ज़ल

गजल

क्या सचमुच नया साल आया है मेरे दिल में आज फिर सवाल आया है हद बढ़ गया नखरा आधुनिक समय का चलने को वो इस बार नई चाल आया है भूखा था वो कल रात से गरीब मुझको तो सुबह उसका ख्याल आया है