हास्य व्यंग्य

आत्मनिर्भरता की गाथा

आज आत्मनिर्भर शब्द सुनकर ऐसा प्रतीत हो रहा था, मानो धरती पर स्वर्ग का रचना होने वाला है। भारतीय नेताओं के मुंह आत्मनिर्भर सुनकर आज मन बहुत प्रसन्न हो रहा है, राजनीति आत्मनिर्भरता शब्द में आत्मा का नामोनिशान नहीं है। निर्भरता तो पूर्वजों की एक अमानत और संस्कृति है। हमारे समाज के लोग हमेशा नजर उठाए […]

कविता

कविता- चिट्ठी का दौर

जब तुम चिठ्ठी लिखा करते थे सच में उलझन रहता था, खामोशियो में इंतजार चिठ्ठी की कई दिनों तक करता था, हर रोज डाक पर हो आते थे पूछ पता तेरे चिठ्ठी की एक ठंडी आहे भरता था, निगाह लगाये राहों पर कि कब डाकिया आयेगा देख डाकिये को अपने गली में मन उमंग भरता […]

कविता

फर्जी आँसू

हर बार की तरह अबकी बार भी लिखने को कोई शब्द नही है, माफ कर दो वो भूखे गर्भवती हाथनी मानवता मर गई है कोई लब्ज नही है, लिख रहे है, उन पशु प्रेमी के लिये जो फर्जी आँसू बहाते आज मानवता की दुहाई चलेगी मोमबत्ती जलेगी नकली आँसू बहेगी, अखबारों में बड़े लेख लिखे […]

लघुकथा

दो गज कफन

कोरोना महामारी के डर से हजारो किलोमीटर पैदल चलकर देवराम बीच सड़क पर थक कर बैठ गये, उसका दम टूटने लगा, पांव दुख रहा है,अब आगे जाने की जरा हिम्मत नहीं रह गई हैं। वो तड़पती आवाज में बोल उठे ” थोड़ा रुक के चलो, अब शरीर भी जिन्दा लाश बन गया है। साथ चलने वाले […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग- लोक और परलोक में

इस समय बिगबॉस की टीआरपी कुछ कम चल रही है समाचार वाले भी परेशान है टीआरपी को लेकर मगर भारत की राजनीति आम जनता के लिए एक मजाक बन गई है। अभी तक बाथरूम में झांकना शुरू हुआ था, अब लोगों की थाली में भी झांकना शुरू हो गया, लोग कैसे खाते, कैसा रहन-सहन है। उधर स्वर्ग […]

कविता

मेरे सपनों का भारत

मेरे सपनों का भारत कहां होगा लुटते अस्मिता नारी का देखा ज्वाला बहती चिंगारी का देखा, मानवता को गिरते देखा उजाले को घिरते देखा, मेरे सपनों का भारत कहां होगा कृषि प्रधान देश का नाम है कृषक को आत्महत्या करते देखा, बदनाम गिरगिट रंग बदलने में माहिर नेताओं को इसमें देखा, मेरे सपनों का भारत […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग- आम लोगों का गिरना

कुछ दिन पहले रात को बाइक से घर लौट रहा था, सड़क के गड्ढे में गिरकर सिर फूट गया। अब घर पर लोगों का तांता लग गया, बहुत खुश हुआ मेरा साहित्य उछल-उछल कर तांडव करने लगा। शाम को कुछ समाचार पत्र वाले आ गए वे मुझसे हालचाल पूछा उसके बाद कागज निकालकर समाचार बनाने की प्रक्रिया शुरू […]

कविता

कविता- पतझड़ और जिंदगी

पतझड़ में बहार ही बहार है चाय की मीठी चुस्कियां गर्म पकोड़ो का बयार है, ठंड की सर्द झोकों में उम्मीद की किरण जगती आसमा के झरोखों में, जिंदगी भी पतझड़ से हो गई टूटकर सपने बिखरे इरादे ना जाने कहां खो गई, उम्मीद पतझड़ के बाद बसंत का बयार है, बस उस पल का […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य- सोशल मीडिया पर समाज सेवा

वो एक समाजसेवी थे, समाजसेवी के साथ पशु प्रेमी भी जुड़ा है, उनका समाजसेवा बड़े-बड़े बैनर पोस्टर और समाचार के हेडलाइंस पर होते थे। टीवी डिबेट वाले अक्सर उन्हें बैठाकर सामाजिक मुद्दे पर चर्चा करवाते हैं। दिल्ली के बड़े-बड़े पार्टी में उन्हें अक्सर देखा जा सकता, उनका अच्छे-अच्छे लोगों से पहुंच था, शहर में करोड़ों की प्रापर्टी दबाकर रखा है। उस […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग- विचारधारा की लड़ाई

नेताजी का चुनाव चल रहा था भाषणबाजी सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा था, नेताजी अपने निर्वाचन क्षेत्र में जगह-जगह विपक्ष को कोस रहे थे। कुछ टीवी समाचार वालों ने सोचा क्यों नहीं अमेरिका की तरह यहां पर डायरेक्ट प्रत्याशीयो का डिबेट हो जाए तो कितना अच्छा रहता। एक बड़े मैदान में मंच लगा वहां पर तमाम […]