पुस्तक समीक्षा

‘नवगीत वाङ्मय’ : कविता के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण संकलन — राजा अवस्थी

[पुस्तक : नवगीत वाङ्मय, संपादक : अवनीश सिंह चौहान, प्रकाशक : आथर्सप्रेस, नई दिल्ली, प्रकाशन वर्ष : 2021 (संस्करण प्रथम, पेपर बैक), पृष्ठ : 174, मूल्य रु 350/-] हिंदी कविता के इतिहास में समवेत संकलनों की एक परंपरा अब स्थापित हो चुकी है। ये समवेत संकलन कभी कुछ सहयोगी मित्रों की कविताओं को साथ लेकर, […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

मोहे रँग दे ओ रंगरेज़

फागुन का सुंदर, सुहावना एवं मनभावन महीना हो और होली का हुड़दंग न हो, रंग-गुलाल की बौछार न हो, फाग-राग न हो, मेल-मिलाप न हो, हास-परिहास न हो, भला ऐसा भी कभी हो सकता है। कम-से-कम ऐसा भारत भूमि— “भलि भारत भूमि” (कविकुल-कमल बाबा तुलसीदास) पर तो सम्भव नहीं लगता— वह भी तब जब ऋतुराज […]

संस्मरण

संस्मरण : लिखना तो बहाना है

कई बार मैंने अपने पिताजी से आग्रह किया कि पिताजी दादाजी के बारे में कुछ बताएं? सुना है दादाजी धनी-मनी, निर्भीक, बहादुर, उदारमना व्यक्ति थे। जरूरतमन्दों की धन आदि से बड़ी मदद करते थे, घोड़ी पर चलते थे, पढे-लिखे भी थे? परन्तु, पिताजी ने कभी भी मेरे प्रश्नों का जवाब नहीं दिया। जब कभी भी […]

संस्मरण

संस्मरण : अभी मन भरा नहीं

सुविख्यात साहित्यकार श्रद्देय देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ जी (गाज़ियाबाद) से कई बार फोन पर बात होती— कभी अंग्रेजी में, कभी हिन्दी में, कभी ब्रज भाषा में। बात-बात में वह कहते कि ब्रज भाषा में भी मुझसे बतियाया करो, अच्छा लगता है, आगरा से हूँ न इसलिए। उनसे अपनी बोली-बानी में बतियाना बहुत अच्छा लगता। बहुभाषी विद्वान, […]

कविता

गीत : छुटकी बिटिया अपनी माँ से

छुटकी बिटिया अपनी माँ से करती कई सवाल चूड़ी-कंगन नहीं हाथ में ना माथे पर बैना है मुख-मटमैला-सा है तेरा बौराए-से नैना हैं इन नैनों का नीर कहाँ- वो लम्बे-लम्बे बाल देर-सबेर लौटती घर को जंगल-जंगल फिरती है लगती गुमसुम- गुमसुम-सी तू भीतर-भीतर तिरती है डरी हुई हिरनी-सी है क्यों बदली-बदली चाल नई व्यवस्था में […]

कविता

गीत : गौरैया रूठ गई

घर-मकान में क्या बदला है, गौरैया रूठ गई भाँप रहे बदले मौसम को चिड़िया और चिरौटे झाँक रहे रोशनदानों से कभी गेट पर बैठे सोच रहे अपने सपनों की पैंजनिया टूट गई शायद पेट से भारी चिड़िया नीड़ बुने, पर कैसे ओट नहीं कोई छोड़ी है घर पत्थर के ऐसे चुआ डाल से होगा अण्डा किस्मत […]

कविता

गीत : अपना गाँव-समाज

बड़े चाव से बतियाता था अपना गाँव-समाज छोड़ दिया है चौपालों ने मिलना-जुलना आज बीन-बान लाता था लकड़ी अपना दाऊ बाग़ों से धर अलाव भर देता था, फिर बच्चों को अनुरागों से छोट-बड़ों से गपियाते थे आँखिन भरे लिहाज नैहर से जब आते मामा दौड़े-दौड़ै सब आते फूले नहीं समाते मिलकर घंटों-घंटों बतियाते भेंटें  होतीं- […]

कविता

गीत : कविता मरे असंभव है

चौतरफा है जीवन ही जीवन कविता मरे असंभव है अर्थ अभी घर का जीवित है माँ, बापू, भाई-बहनों से चिड़िया ने भी नीड़ बसाया बड़े जतन से, कुछ तिनकों से मुनिया की पायल बाजे छन-छन कविता मरे असंभव है गंगा में धारा पानी की खेतों में चूनर धानी की नये अन्न की नई खुशी में […]

कविता

गीत : गगन में घिर बदरा आए

धरती पर धुंधगगन में घिर बदरा आएलगे इन्द्र की पूजा करनेनम्बर दो के जल सेपाप-बोध से भरी धरा परबदरा क्योंकर बरसेकृपा-वृष्टि हो बेकसूर परहाँफ रहे चौपाएहुए दिगम्बर पेड़, परिन्दे-हैं कोटर में दुबकेनंगे पाँव फँसा भुलभुल मेंछोटा बच्चा सुबकेधुन कजरी की और सुहागिन का टोना फल जाएसूखा औ’ महँगाई दोनोंमिलते बाँध मुरैठेदबे माल को बनिक निकालेदुगना-तिगुना ऐंठेडूबें जल में खेत, हरित होंखुरपी काम कमाए