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  • संस्मरण : अभी मन भरा नहीं

    संस्मरण : अभी मन भरा नहीं

    सुविख्यात साहित्यकार श्रद्देय देवेन्द्र शर्मा ‘इन्द्र’ जी (गाज़ियाबाद) से कई बार फोन पर बात होती— कभी अंग्रेजी में, कभी हिन्दी में, कभी ब्रज भाषा में। बात-बात में वह कहते कि ब्रज भाषा में भी मुझसे बतियाया...


  • गीत : गौरैया रूठ गई

    गीत : गौरैया रूठ गई

    घर-मकान में क्या बदला है, गौरैया रूठ गई भाँप रहे बदले मौसम को चिड़िया और चिरौटे झाँक रहे रोशनदानों से कभी गेट पर बैठे सोच रहे अपने सपनों की पैंजनिया टूट गई शायद पेट से भारी चिड़िया...

  • गीत : अपना गाँव-समाज

    गीत : अपना गाँव-समाज

    बड़े चाव से बतियाता था अपना गाँव-समाज छोड़ दिया है चौपालों ने मिलना-जुलना आज बीन-बान लाता था लकड़ी अपना दाऊ बाग़ों से धर अलाव भर देता था, फिर बच्चों को अनुरागों से छोट-बड़ों से गपियाते थे...


  • गीत : गगन में घिर बदरा आए

    गीत : गगन में घिर बदरा आए

    धरती पर धुंधगगन में घिर बदरा आएलगे इन्द्र की पूजा करनेनम्बर दो के जल सेपाप-बोध से भरी धरा परबदरा क्योंकर बरसेकृपा-वृष्टि हो बेकसूर परहाँफ रहे चौपाएहुए दिगम्बर पेड़, परिन्दे-हैं कोटर में दुबकेनंगे पाँव फँसा भुलभुल मेंछोटा बच्चा सुबकेधुन कजरी की और सुहागिन...