लेख सामाजिक

क्या सर्वोच्च न्यायालय के विश्वसनीयता पर लग गया प्रश्न चिन्ह ?

लोकतंत्र के चार स्तंभ विधायिका , कार्यपालिका , मीडिया और न्यायपालिका है , जिनमे पहले तीन स्तंभों पर यदा कदा सवाल उठाए जाते रहें हैं या सवाल उठते रहें हैं । लेकिन लोकतंत्र का चौथा महत्वपूर्ण स्तंभ न्यायपालिका सदैव इससे अछूता रहा है । क्योंकि जहाँ एक ओर आज भी देश में न्यायपालिका पर जनता […]

कविता

स्वर्ण सिक्के

चंद स्वर्ण सिक्के  जो शायद धरोहर हो  हमारे पूर्वजों के  सोचता हूँ अगर ये  कभी संग्रहित करने के बदले  गरीब मजलूमों पर  व्यय कर दिए गए होते  भारत कभी सोने का चिड़ियाँ था  यह इतिहास नहीं होता         अमित कु अम्बष्ट ” आमिली “

कविता

प्राण छूटे ते छूटे

उम्र तो हर दिन बढे मोह का बंधन छूटे ना कर्म से सब फल मिले भाग्य अगर जो फूटे ना लाखों हो चाहे चोर उच्कके  विधा धन कोई लुटे ना जीवन बस संघर्ष कथा मालिक बस दम घुटे ना सुख में संग सब बंधु बांधव दुख में फिर कोई जुटे ना दीन अमीर सब हिय […]

सामाजिक

सवाल सिर्फ स्कूल की सुरक्षा व्यवस्था का नहीं है

विगत दिनों दो अलग अलग निजी स्कूलों में घटित घटना ने संपूर्ण देश को झंकझोर कर रख दिया है । पहली घटना हरियाणा में गुरूग्राम के रेयान स्कूल की हैं , दूसरी कक्षा में पढने वाले छात्र प्रद्युम्न की हत्या उसी स्कूल के बस कंडक्टर ने यौन उत्पीड़न की  कोशिश के दौरान उसी स्कूल के […]

कविता पद्य साहित्य

भूख

अंतरियाँ बच्चों की जब  कुलबुला उठती है रात्रि पहर  माँ दौड़ती है  सहेज कर रखे खाली  ढक्कन टूटे डब्बे की तरफ  जबकि वो जानती है  कुछ भी शेष नहीं है उसमें  कुछ बचे रह जाने के भ्रम के सिवा  वो बिलखते बच्चों के भूख से  हारती नहीं है रशीद कर देती है  दो चार थप्पर  […]

कविता पद्य साहित्य

मुझमे ही तू है

मुझमे ही तू है  मैं हूँ तुझमे ही समस्त ब्रह्माण्ड ही है  हम में ही समाया  जग राधा कहे मुझको तू  सबका मोहन प्यारे ये तो जग के खातिर  बस तेरी ही माया  यमुना के तीर तेरी राह तकू मैं     जबकी तू तो मेरे  कण कण में समाया गईयन भी तुम बिन  चुप […]

कविता

नसीब

नसीब भृकुटि के उपर ललाट पर खिंची अर्द्धवृत्ताकार रेखा नहीं है न ही हथेलियों पर जन्म के साथ अमानत में मिली आरी – तिरछी रेखाएँ है पता नहीं नसीब ईश्वर लिखता भी है या नहीं अगर लिखता है तो फिर कुछ लोग अपना नसीब खुद ही कैसे लिख लेते है नसीब का अच्छा होना या […]

गीत/नवगीत पद्य साहित्य

न ना पिया

न ना पिया आज मैं तुमको नहीं बाहों में भरने दूँगी नयनों में भरे लाज मेरे शर्म की घूंघट नहीं खोलूँगी न ना पिया आज मैं तुमको नहीं बाहों में भरने दूँगी मेरा तन है जैसे पनघट पर प्यासे को मिले नदिया की धारा तेरा मन बावड़ा जैसे फतिंगा चिरागों से हारा मेरे छलकते मधु […]

कविता पद्य साहित्य

वादा

बहुत आसां है तोड़कर वादे को अपने आगे निकल जाना पर कभी फुर्सत में सोचना बैठकर इसकी एहमियत जब हम गर्भ में अंकुरित होते है तो माँ खुद से करती है वादा कि असहनीय पीड़ा के बावजूद वो घुटने नही टेकेगी और महफूज रखेगी अपने उदर में हमारी सांसे और जन्म के बाद पिता कस […]

कविता पद्य साहित्य

एक खत

साजन भेज रहीं हूँ  तुम्हें  हौसले से लिखा एक खत यकीन मानों इसमें   शामिल नहीं हैं मेरा कोई दर्द और आंसूओं के एक एक कतरे से महफूज रखा है शब्दों को   ताकि तुम्हारी दृढ़ संकल्पित आंखो की क्यारियों में  छलछला न जाए नमकीन पानी क्योकि  मुल्क सुरक्षित है  सिर्फ तब तक  जब तक मुल्क […]