कविता

सड़क या नारी

  पहले मुझे बनाते हो और … जब बन जाती हूं मंजिल तक पहुंचाने के लायक … फिर जी भर के मुझे सताते हो! रोंदते हो पांव तले, सिगरट तक मुझ पर बुझाते हो! रफ़्तार से तुम्हारी डर जाती हूं घुट घुट कर में भी मर जाती हूं पर मौत भी मेरी, कहां तुम्हें पसंद […]

कविता

मज़बूरी

  दिखते हैं.. पढ़े-लिखे, और बिन डिग्री वाले भी, बेचते हुए,,, अपना समय और काबलियत कभी पात्र, तो कभी अपात्र को देखते और दिखाते हैं, खुद को,,, अनगिनत… दिव्य स्वप्न और बदले में उठा लाते हैं बहुधा संग अपने … बोझ और व्याधियां पैसा कमाने की जद्दोजहद या हालात सुधारने की चेष्टा जन्म देती है… […]

कविता

मेरा मन

अश्वमेध यज्ञ के अश्व समान, निरन्तर दौड़ता है मेरा मन। किन विषयों पे लिखूं और किन को छोड़ूं संभ्रमित रहती है … मेरी कलम । कभी सोचती हूं, कुछ नायाब लिखूं जो लिखा न हो किसी ने वो ख़्याल लिखूं । यादों पे लिखूं, वादों पे लिखूं या अनसुनी, बिखरी सी फरियादों पे लिखूं। पर […]

कविता

दीवाली का पर्व

हो उत्साहित खूब धूमधाम से इक बार,,, फिर से सभी ने है दीपावली का पर्व मनाया! जला के दीए और रौशनी की लड़ियां है… धरती से तम को भगाया !!   पर,,,, ज्वलंत प्रश्न है समक्ष हमारे, मन के भीतर क्यों? फैला है अंधेरा ! हममें से… है कितनों जनों ने भीतर के तम को […]

कविता

मां बनते ही हर महिला

  मां बनते ही हर महिला, जाति-विहीन हो जाती है! शूद्र-क्षेत्रीय-ब्राह्मण-वैश्य बन रोज़ाना नित नई भूमिका वो निभाती है!! पालन करते हुए शिशु का, परिचारिका वो बन जाती है! बच्चे की रक्षा की खातिर, क्षत्रिय वो हो जाती है!! देते हुए संस्कार बच्चे को ब्राह्मण की भूमिका निभाती है! बच्चे के लिए करती संचित धन […]

लघुकथा

अपना परिवार

“सुनो ! मां दीवाली पर यहां आने की बात कर रही है। कह रही थी कि सुनील के बच्चे भी कह रहे हैं कि ताऊ जी का नया घर नहीं देखा है।” गौरव बोला। “पर दीवाली तो सभी अपने घर पर ही मनाते हैं।” अनमनी सी मानसी बोली। “पर, यह भी तो उनका अपना ही […]

कविता

प्रकृति से खिलवाड़ कर…

प्रकृति से खिलवाड़ कर पहाड़ों जंगलों को काट कर विकास का दीप जलाया है ..पर यह हमने क्या पाया है। ढांचागत विकास कर फैक्ट्रियों- मशीनों का निर्माण कर धरती के तापमान को बढ़ाया है ..पर यह हमने क्या पाया है। गरम हो रही है धरती नदियों ने बदली है धारा यह खतरनाक रसायनिक कचरा और […]

कविता

मां की स्तुति में धनुषाकार पिरामिड

दे माता आशीष हो कल्याण भवतारिणी दुष्ट संहारिणी जय मां जगदम्बे मैं ज्योति जलाऊं आरती गाऊं पुजूं तुझे नमन दुर्गा मां   है तुझे नमन मैया काली मनोहारिणी संकटनाशिनी सर्वविद्या दायनी ये कोरोना काल बना जंजाल वनदुर्गा विपदा हर लो   अंजु गुप्ता

कविता

मुझमें भी… इक सागर

  हां! सिमटा है मुझमें भी… इक सागर। जो रह कर मौन करता है समाहित खुद में,,, अनगिनत … तर्कों- वितर्कों को।   नदियों समान लोग लाते हैं संग अपने मीठे पानी की तरलता और कभी …गरल और कचरा ।   कुतर्कों से उत्पन्न “वेग – द्वेष” से जब सुलगता है मन, और खौलने लगता […]

लघुकथा

थप्पड़

  भरे पूरे परिवार वाली अम्मा का जीवन वैसे तो खुशहाल था, पर बड़े बहू – बेटे के पराएपन ने उनको अंदर तक तोड़ दिया था। पत्नी धर्म के आगे बड़े बेटे का मातृधर्म कहीं दब गया था। सीधे मुंह बात करना तो दूर, उनका हालचाल पूछना भी उसे भारी लगता था। आज वही अम्मा […]