लघुकथा

दस्तक

अपने सपनों को हकीकत का जामा पहनाने जब ज़ाकिर ने भरे पूरे परिवार को गांव में छोड़ महानगरी की ओर पलायन किया, तो उसका मन अक्सर परिवार को याद कर बेचैन हो उठता था। पर धीरे – धीरे शहर की चकाचौंध वाली जिंदगी उसे इतनी रास आई कि वह सब पुराने आचार – विचार भूल […]

लेख

कुदरत का न्याय

कुदरत का न्याय कभी जंगलों में घूमने, कंदमूल पर जीवन निर्वाह करने, प्रकृति की पूजा करने वाला मानव, साइंस और टेक्नोलॉजी के कंधों पर सवार हो, जाने कब इतना सबल हो गया कि उसने प्रकृति का ही दोहन शुरूं कर दिया । मानव ने प्रचुर मात्रा में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का इतना दुरुपयोग किया कि […]

कविता

न्याय

चाहे बन्धी है आखों पर, मुलायम मखमल की पट्टी । पर कानून की देवी, अब अंधी नहीं है ।। देख मुद्देई की, पद, पैसा, हैसियत । न्याय का तराजू , अब करता है न्याय ।। गर पैसा और पद है, माफ अपराधी के आधे पाप । और… गर नेता है तो, वादी के सब गुनाह […]

लघुकथा

शक

छोटी सी उम्र में ही सुमन के मां-बाप गुजर गए थे! चाचा- चाची ने ही उसे पाला-पोसा था ! शादी का भारी भरकम खर्च उठाने का सामर्थ्य और इच्छाशक्ति दोनों ही नहीं थीं, सो जब 45 वर्षीय विधुर विनय का रिश्ता आया, वे मना न कर पाए ! चंचल, सुंदर सुमन भी इसे अपनी नियति […]

लघुकथा

साक्षात्कार

पिता की मृत्यु के पश्चात, घर की तंगहाली और बडी़ होने का फ़र्ज़ निभाने की खातिर नौकरी करना स्वर्णा की मजबूरी बन गया था ! आज उसका पहला साक्षात्कार था… “पहले कभी कोई काम किया है ?”, मैनेजर बोला ! “जी नहीं, यह मेरी पहली नौकरी हैं ! ” स्वर्णा बोली ! “आपको क्यों लगता […]

लघुकथा

मोहन निवास 

घर में जगह की कमी लगने पर रोहन अपने वृद्ध पिता मोहन जी से बोला, “पिताजी, बच्चों की बोर्ड की परीक्षा सिर पर है, कुछ दिनों के लिए आप बरसाती पर शिफ्ट हो जाइए।” ”मगर बेटा, इस उम्र में मुझसे रोज ऊपर-नीचे चढ़ना-उतरना कहाँ हो पायेगा ?” पिता ने असहाय होकर बोले । ”अरे पिताजी […]

लघुकथा

रिश्वत

“अरे भाभी, सुना है तेरे दामाद ने सॉउथ -एक्स में नई कोठी ली है?” आँखें नचाती सुमित्रा ने अपनी पड़ोसन शान्ति से पूछा ! “हाँ ! अभी कल ही मुहूर्त हुआ है !” मंदिर की सीढ़ियां चढ़ते हुए शान्ति बोली ! “अच्छा, उसकी जनकपुरी वाली कोठी का क्या हुआ? अच्छी खासी रकम मिल गयी होगी […]

कहानी

अलविदा

सात बजे का अलार्म के बजते ही नित्या रोज़ की तरह रसोई के काम निपटाने लग गयी। वह कॉलेज में प्रोफेसर थी और दिन में उसे सिर्फ दो या तीन लेक्चर ही लेने होते थे ।आज उसका लेक्चर ग्यारह बजे था, सो आज आराम से घर के बाकि काम भी निपटा सकती थी । रोज […]

क्षणिका

क्षणिकाएँ

इश्क ऐ काश ! ये वक़्त ठहर जाता और ठहर जाता, हम – दोनों में वो बीता हुआ इश्क़ !! तेरे बिन बिन तेरे…. यूँ तो हम, अधूरे नहीं हैं, पर जाने फिर भी क्यों…. हम पूरे नहीं हैं !! कलयुग सतयुग नहीं,,, वो भी कलयुग था ! जब इन्द्र सम पुरुष धर छद्मवेश करते […]

क्षणिका

क्षणिकाएँ

-1- दुखता है ये दिल, और बात बस इतनी है… तुम मेरे हो, पर मेरे नहीं हो !! -2- फर्क है… तेरे और मेरे समर्पण में ! मैं तुझको और तू मेरी देह को समर्पित है ! ! -3- बिन तेरे…. यूँ तो हम अधूरे नहीं हैं, पर जाने फिर भी क्यों… हम पूरे नहीं […]