बाल कहानी

बहादुर राहुल

पांचवीं कक्षा में पढ़ने वाला राहुल बहुत ही समझदार बच्चा था। रोज़ की भांति जैसे ही वह स्कूल से निकला, सामने आइसक्रीम वाला नज़र आया। आइसक्रीम राहुल की कमज़ोरी थी। खुश होकर राहुल आइसक्रीम वाले की तरफ लपका। पर यह क्या, आज रोज वाले भैया की जगह कोई और आइसक्रीम बेच रहा था। राहुल को […]

कविता

अब तलक

थिरक रहे थे, अब तलक यह पांव धुन पे तेरी तेरी धुन पर नाचने का … चलन मैं छोड़ रही हूँ। दिल छलनी हो जाता है जब बोलते हो – “दिन भर क्या करती हो ?” बन कठपुतली ताने सुनने का … क्रम मैं तोड़ रही हूँ। पावों की पायल मेरी सरगम लगती थी अब […]

कविता

“ऐ” दिल, आज फिर …

दिल के कोने में सिकुड़ी – सिमटी सी इक ख्वाहिश अक्सर,,, करती है फरियाद दिल से “ऐ” दिल, आज फिर… भूल उम्र का तकाज़ा जिम्मेदारियों के बहाने चल पड़ उस राह पर जहां वक़्त अभी रुका सा है सफ़र भी थमा सा है और ना जाने कितनी दास्तां जिंदगी को समेटे खुद में बन अफसाना […]

कविता

सिलवटें

सजती है, संवरती है बिंदिया माथे पे लगाती है भरने लगती है मांग सिंदूर पर… कुछ सोच कर वो रुक जाती है। चोर नजरों से देख अपंग पति को आंखों की नमी छुपाती है पोंछती है चुपचाप,,, अपनी नम आंखें, फिर… लबों पर लाली वो सजाती है । पोत के चेहरा अबला फिर दहलीज… सीमाओं […]

कविता

दुभाषिए

न जातपात न सरहदें अंजान है वो… अजानों और घंटियों की आवाज़ों से मजहबी नफ़रत के दरवाजों से हां! तन – मन के उजले “शान्तिदूत” कपोत लिए स्वतंत्रता और भाईचारे का सन्देश विचरें,,, नील गगन में … बन दुभाषिए । अंजु गुप्ता

कविता

सुनो सजना…

सुनो सजना… सुनो सजना ! सुरमई शाम ने फिर शरारत भरी,,, साजिश की है। सुनहरे सपने दिखा, सतरंगी एहसास जगा, सात सुरों की छेड़ के सरगम, संग दिल के,,, दिल्लगी की है। सुनो साजन ! सांसों ने फिर सांसों में सिमटने की तमन्ना की है । अंजु गुप्ता

लघुकथा

क्वारंटाइन

  “सुरभि बेटा, यह क्वारंटाइन क्या होता है?” कमरे के बाहर खड़ी सुरभि से अख़बार से नज़र उठाते हुए दादी ने पूछा। “अरे दादी! कोरोना बीमारी की वजह से मरीजों को बाकी लोगों से अलग रखा जाता है, ताकि वो और बाकी लोग सुरक्षित रह सकें” सुरभि दादी की नादानी पर हसते हुए बाहर से […]

कविता

नारी

नारी हूं मैं शक्ति हूं मैं ईश्वर की अभिव्यक्ति हूं कभी निर्मल, तो कभी ज्वाला हूं मैं संस्कारों की शाला हूं। बहुभुजा धारिणी बन के बहुमुखी प्रतिभा दिखलाती हूं बन दुर्गा – लक्ष्मी और सरस्वती अनंत किरदार निभाती हूं। सह कर असाध्य प्रसव वेदना सृष्टि सृजन बढ़ाती हूं बन मां, बहन, बहू और बेटी घर […]

कविता

वर्ण पिरामिड : शिव शंकर

है माथे चन्द्रमा हलाहल शिव कंठ में अर्धनारीश्वर सृष्टि पालनकर्ता है भोला शंकर अन्तर्यामी महिमा न्यारी शांत करे चित्त भक्तों का रखवाला। हैं शिव गृहस्थ वीतरागी श्मशान वासी अर्धनारीश्वर तथापि कमाजित। — अंजु गुप्ता