गीतिका/ग़ज़ल पद्य साहित्य

बहुत रौशन सवेरा भी नही था

बहुत रौशन सवेरा भी नही था मगर इतना अंधेरा भी नही था मिरी बेचैनियां बढ़ने लगीं थीं मुझे यादों ने घेरा भी नही था तुम्हारी भी कमी कर देता पूरी ये सुख ऐसा घनेरा भी नही था वहाँ खुशियों की बस्ती कैसे बसती वहाँ ग़म का बसेरा भी नही था उसे मैं ढूंढते उस पार […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक : मरम्मत

सजदे में  ग़र हो सर तो  नेमत अता करे बुझते  हुए  दिए  की हिफाज़त हवा करे ईमान बांध  कर चलें जो उसकी राह पर बिगड़े  मुक़द्दरों  की  मरम्मत  ख़ुदा  करे

गीतिका/ग़ज़ल पद्य साहित्य

शहर की हालत

कोई   हंसती   हुई   सूरत   नहीं   देखी  जाती अब तो इस शहर की हालत नहीं  देखी जाती रश्क करते  हैं  सभी  मेरी  लिखी ग़ज़लों पर उनसे  ज़ख़्मों  की  इबारत  नहीं  देखी जाती दिल  में जलता  है पर हंस के गले मिलता है ऐसे  कमज़र्फ  की  फितरत नहीं  देखी जाती दिल  के  बदले  में  सर  पेश  किया  […]

गीतिका/ग़ज़ल पद्य साहित्य

चले गए- ग़ज़ल

इक पल को मुस्कुराये रुलाकर चले गए आये  ज़रा  सी  देर  को  आकर चले गए मुद्दत  से  बादलों  का  हमे  इंतज़ार  था बरसे मगर वो प्यास  बढाकर  चले  गए इस दर्जा तल्ख़ियों की वजह उनसे पूछली सारी  कमी  हमारी  गिनाकर  चले  गए शायद किसी मक़ाम की जल्दी में थे ‘अज़ीज़’ रस्ते  जो  वापसी  के  मिटाकर  […]

मुक्तक/दोहा

वक़्त

वक़्त   जैसा   भी  हो  वैसा  ही  काट  लेता  हूँ ग़ैर  का  दर्द   भी  अक्सर  में  बाँट   लेता   हूँ ज़िन्दगी तुझसे ये फुर्सत कभी मिले न  मिले सुकूँ  के  लम्हों  को  ग़म  में भी छाँट लेता हूँ

मुक्तक/दोहा

सवाल

इक तो नज़र के तीर ने मुझको निढाल कर दिया उसपर अदा-ए-शोख़ ने कैसा  कमाल कर दिया मैंने  जो  अपने  प्यार  का  उनसे मुतालबा किया उसने जवाब-ए-इश्क़ में मुझसे सवाल कर दिया

गीतिका/ग़ज़ल

ज़ख़्म

ज़ख़्म अपने कुछ इस तरह तराशते हैं मकान बंद है हम फिर भी उसमे झांकते हैं चाँद है दूर बोहोत दूर हमारी ज़द से अजब जुनू है बा उम्मीद हो के ताकते हैं बात जिससे भी की हरवक़त अनसुनी ही रही सभी मसरूफ है बस अपनी अपनी हांकते हैं तेरे शहर का भी मयार गिर […]

कविता

लम्हे

मेरे ख़्यालों की नरम चादर में उलझे लम्हे तरस रहे हैं जो तेरी ख़ुश्बू से तर थे पहले क्यों आज ख़ाली गुज़र रहे हैं यही वो दिन थे यही वो रातें यही थे मंज़र यही वो बातें यही थी गलियाँ यही ठिकाने जो सब थे पहले अब भी वही हैं ग़र ये वही हैं तो […]