हास्य व्यंग्य

व्यंग्य : हादसे

भारत हादसों का देश है । यहां सबके अपने -अपने हादसे और अपने -अपने मनोरंजन हैं। यहां किसी एक का हादसा किसी दूसरे का मनोरंजन भी हो सकता है।दशहरे से पहले इलाहबाद प्रयागराज हो गया ,ये बात कुछ लोगों के लिए हादसा है और कुछ दूसरे लोगों के लिए आत्मसुख।जो लोग इलाहबाद की ट्रेन में […]

हास्य व्यंग्य

कंगाली में आटा गीला

वे भाग गए हैं। वे अपनी लुंगी धोती सब समेट के विदेश भाग गए हैं । आप कहते हैं कि अपनी एक एक पाई बसूल कर करेंगे । वे कहते हैं अपनी धोती भी न देंगे जाओ, जो करना है सो कर लो। ये दीगर बात है कि कर्ज़ेदारों की इज्जत बड़ी होती है शानों […]

हास्य व्यंग्य

एक मसीहा जो नेता बनते -बनते रह गया।

आजकल अच्छा आदमी होने और मसीहा होने के बीच जबदस्त मुकाबला देखा जा सकता है ।मुकाबला तो नेता,अच्छे आदमी और मसीहा इन तीनों के बीच में है लेकिन जीत हमेशा नेता रहा है। न सिर्फ जीत रहा है बल्कि मसीहा और अच्छे आदमी को मुह भी चिड़ा रहा है। मैं देख रही हूं सारे ही […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य : चोटी की प्रधानता

हमारे देश में आजकल धड़ाधड़ चोटियां काटी जा रही हैं ।अभी बिहार में लालू यादव की चोटी कट गई ।देश में कांग्रेस की चोटी प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति यहां तक की उपराष्ट्रपति पद तक कट गई।जी एस टी के तहत बड़े बड़े टैक्स चोरों की चोटियां कट गयीं। नोटबंदी में भ्रस्टाचारियों की और कालाधन रखने […]

कविता

एक अतुकांत कविता – मुक्ति

आदमी भ्रम में जीता है ! ज़िन्दगी भर, मौत तक । आदमी की तलाश आनंद है तलाश मुक्ति की …………! मुक्ति ही आनंद है। मगर मुक्ति नहीं मिलती ….. किसी कीमत पर नहीं। थका हारा इंसान मौत को खोजने लगता है या कहूँ………………….. मुक्ति खोजने लगता है । खोज आनंद की। आनंद ही मुक्ति है। […]

भाषा-साहित्य

व्यंग्य

व्यंग्य में इतनी आपाधापी,अंतर्विरोध क्यो है ?हम आगे बढ़ने के बजाय कदमताल क्यों करने लगते हैं। ऐसा क्यों है ? ऐसा व्यंग्य में ही क्यों है ? आखिर व्यंग्य का सही विधान क्या है ? या हर व्यंग्यकार का अपना निजी विधान ही व्यंग्य का विधान है ।जिसमें चाटुकारिता का महत्वपूर्ण स्थान है ! सौ […]

हास्य व्यंग्य

चिन्दी चिन्दी हिन्दी (व्यंग्य)

चिन्दी चिन्दी दिन गुजरा चिन्दी चिन्दी रात गयी चिन्दी चिन्दी हिंदी में चिन्दी चिन्दी बात गयी । हमारे देश में कश्मीर से कन्याकुमारी तक हिंदी का सिर्फ नाश होता है मगर बिहार से बंगाल आते आते सत्यनाश हो जाता है । बिहार और बंगाल का बॉर्डर छूते -छूते कर्ता और कर्म दोनों को पता नहीं […]

हास्य व्यंग्य

एक व्यंग्य, हे दलित श्रेष्ठ।

ज्योतिराव फुले द्वारा इस्तेमाल किया गया शब्द दलित आज राजनीति में महत्वपूर्ण स्थान रखता है या यूँ कहूँ की ये राजनीति की धुरी है तो गलत नहीं होगा। सवाल उठता है दलित कौन हैं? क्या वर्ग विशेष में जन्म लेने वाले ही वंचित हैं, दलित हैं !!क्या दूसरे वर्गों में कभी वंचित नहीं हुए, या […]

कविता

ज़िन्दगी ।

शिकायतों और उम्मीदों के बीच कहीं एक पतला सा धागा है बस इतनी ही है ज़िन्दगी उम्मीदों की डोरियों से जब दूसरों के मन बंध जाते हैं तब शिकायतें सिरों पर टिकती नहीं हैं अक्सर फिसल जाया करती हैं ज़िन्दगी की डोर पर से बस ये ही तो है ज़िन्दगी!! जब शिकायतें फिसलती रहती हों […]

अन्य लेख लेख

नदी को मनुष्य का दर्जा

नैनीताल हाइकोर्ट ने गंगा और यमुना को मनुष्य का दर्जा दिया है । क्या कोई ऐसी अदालत है जहां मनुष्य को नदी का दर्जा दिया जा सके । आप सोचेंगे ये क्या पागलपन है । हाँ मैं ऐसी मनुष्य नहीं बनना चाहती जहाँ कोण कोण पर बनावटी पन और दोगलेपन के पैमाने से मनुष्यता नापी […]