कथा साहित्य कहानी

हिंदी प्रेम

खाना खाने के बाद, बच्चे टी वी देखने में मस्त हो गये और पत्नी जी किचन का काम समेटने लगी। अवस्थी जी मोबाइल ले कर बाहर लॉन में निकल आये। अवस्थी जी चार साल पहले ही बैंक में प्रोबेशनरी ऑफीसर के पद पर नियुक्त हुये थे। और करीब एक साल पहले आपका ट्रांसफर दिल्ली की […]

कथा साहित्य लघुकथा

ई-संवेदनाएं

मै आज चुपचाप देख रही हूँ, अपनों को, अपनों की प्रतिक्रियाओं को। आज ना मेरे मोबाइल की घंटी नही बज रही है ना ही मेरी डोर बेल, हाँ सुबह से कोई सौ सवा सौ नोटीफिकेसन्स आ चुके हैं, मेरे फेसबुक, ट्वीटर, इन्स्टाग्राम पर भी लगातार कुछ मैसेजेस आ रहे हैं। मेरे आस पास दो चार […]

लेख सामाजिक

आत्महत्या (रोकथाम ?) में फिल्मों की भूमिका

आज से पहले मैने ना इस दिवस के बारे में सुना था, ना ही पढा था, किंतु जब अखबार में इस दिवस के बारे में पढा तो कुछ सोचने पर मजबूर अवश्य हो गयी। कई सारी घटनाएं याद आने लगी, खास कर कई फिल्मी हस्तियों( दिव्या भारती, जिया खान, इंदर कुमार, कुशल पंजाबी जैसे कई […]

गीतिका/ग़ज़ल पद्य साहित्य

मुस्कुराते रहो

प्यार के गीत गाते रहो । हर हाल मुस्कुराते रहो ॥ जीत हार से होकर परे । जश्न ए खुशी मनाते रहो ॥ छोड़ परेशानी जमाने की । तराने नये गुनगुनाते रहो ॥ गिरा दीवारें जात पात की । गिरों को गले से लगाते रहो ॥ बढ़ता चल,चलना ही जिंदगी । ठहरों को बात ये […]

कविता पद्य साहित्य

सगे- सम्बंधी

आखिर क्या है सम्बंध सगे- सम्बंधी में या बिना संबंध के ही रहते हैं एक साथ जैसे रहते हैं कई बार लोग या दोनों है एक दूसरे के पूरक क्या इस युग्म में समाहित हैं वो संबंध भी जिनके मध्य नहीं है कोई संबंध, संबंध होकर भी क्या ये मिलकर बनाते हैं परिधि जिसमें समा […]

कविता

स्त्री

स्त्री चाहे घरेलू हो या कामकाजी रसोई मिलती है उसे By Default सडक पर भिडती है अचानक से दो गाडियां एक से निकलती है औरत दूसरे से उतरता है आदमी भीड से आती है आवाज उफ ये औरतें क्यों चलाती हैं गाडियां By Default देर रात घर लौटे बेटे को सहानुभूति और स्त्री को मिलती […]

कथा साहित्य लघुकथा

मासूम शिकायत

सुबह के काम निपटाकर नाश्ता लेकर बैठी थी, एक हाथ में चाय का कप और दूसरे में टीवी. का रिमोट था, टीवी ऑन करने ही जा रही थी कि तभी किसी की आवाज सुनाई दी, डोरबेल की आवाज नही थी, फिर भी लगा शायद सूरज वापस आ गया हो, डाइनिंग टेबल से मेन गेट की […]

ब्लॉग/परिचर्चा

आओ शायरी सीखें – आर. एस. बग्गा जी

आर. एस. बग्गा जी का नाम शायरी एवं गजल के क्षेत्र में आज किसी परिचय का मोहताज नही, और मेरी कलम में इतनी ताकत भी नही कि उनके बारे में लिख सकूं। उनके महान व्यक्तित्व को कलमबद्ध करने कें लिये मेरी ये अल्पमति पर्याप्त नही। फिर भी साहस करके कुछ शब्दों के माध्यम से आप […]

गीतिका/ग़ज़ल

गजल अहसासों की – पहली कडी

चांद की तरह वो अक्सर, बदल जाते हैं। मतलब अली काम होते निकल जाते हैं॥   स्वाद रिश्तों का कडवा, कहीं हो जाय ना छोटे मोटे से कंकड, यूं ही निगल जाते है   शौक तिललियों का हमने पाला ही नहीं बस दुआ सलाम करके निकल जाते हैं   हौसले की पतवार हों, हाथों में […]

गीतिका/ग़ज़ल

मालूम नही

दिन इक और जिया या गुजरा, मालूम नही| खुद से खुश हूं या खफा खफा, मालूम नही|| सांसे घडी घडी देतीं, गवाही जिन्दगी की| कितना जिंदा हूँ कितना मरा, मालूम नही|| खरीदी फकीर से कुछ दुआएं, हमने भी| हुआ सौदे में घाटा या नफा, मालूम नहीं|| छोड पायल उसने, पैरों में घुंघरू पहने| महज शौक […]