कविता

मन की गति

मन की गति का अनुमान लगाना दुष्कर है ये ऐसा सागर है जिसका पार पाना दुष्कर है बस्ती बस्ती कानन कानन, भटके दिशा दिशा हां लक्ष्य पर अपने ध्यान टिकाना दुष्कर है मन ही में तो बनती हैं, दीवारें नफरत की प्रेम है ईश्वर मन को समझाना दुष्कर है अंधेरा है अज्ञानता का, है मैं […]

कविता

जीवन-साथी

पिता का बीज और माँ की गर्भ, मिलते हैं इस दुनिया में रंग बिरंगे, कई फूल खिलते हैं बड़े प्यार से हर माँ, अपना रुधिर बच्चे को देती बच्चे के सुख कि खातिर, कई कष्ट सह लेती पिता खुशी से बनाता, भविष्य कि योजनाएँ कैसे दूर होंगी, पग पर आने वाली विपदाएँ बच्चे के लिए […]

गीतिका/ग़ज़ल

कितना घबराया है इस हालात से आदमी

वाकिफ हो गया अपनी औकात से आदमी कितना घबराया है इस हालात से आदमी बादशाह-ए- कुदरत समझ बैठा था नादान पस्त बैठा है अपने घर पे शह मात से आदमी किस-किस की मौत लिखी है कोरोना से घबरा रहा है ऐसे-ऐसे सवालात से आदमी जिनसे मिलने को निकलता था घर से रोज आज डर रहा […]

गीतिका/ग़ज़ल

अब तेरी रहनुमाई का मोहताज नहीं है

अब तेरी रहनुमाई का मोहताज नहीं है तुमको मालूम है वो मजबूर आज नहीं है यूं लगता है जलाकर आया ख्याल पुराने ओढ़े रहता जिसे वो नकाब-ए-लाज नहीं है सर पर एक भोज है उसके फेंक देगा यकीनन हीरे मोती जड़ा हो जैसे कोई ताज नहीं है अपनी लड़ाई अकेले ख़ुद ही लड़ रहा वो […]

गीतिका/ग़ज़ल

बड़ी मुश्किल में हूँ इसका हल क्या होगा

बड़ी मुश्किल में हूँ, इसका हल क्या होगा चिंता में डूबा सोचूँ, आख़िर कल क्या होगा इमारत ढह जायेगी, आ जाए जो तूफाँ खोखली हो बुनियाद, महल क्या होगा रहे बेसब्र, काबू ना रहता, भटकता है मन सा दुनिया में दूजा, बेकल क्या होगा शिकायत ना हो कोई, ना हो गिला कोई खुशी हो दिल […]

कविता

दोनों पीढ़ियाँ ज़िंदादिल हो

दूरियाँ इतनी ना बढ़ाओ कि पास आना मुश्किल हो क्यूँ ना घर का बच्चा हमारी गुफ्तगू में शामिल हो खुदखुशी का ख़्याल भी कभी ना ज़हन में आए दिल खोल पाएँ ये हमसे विश्वास ऐसा हासिल हो ना जाने कितनी तकलीफ़ें देती है ये नादान उम्र तकलीफ़ें इनकी सुनें घर के बड़े और बड़ा दिल […]

कविता पद्य साहित्य

क्रंदन करते रिश्ते

क्रंदन करते रिश्ते तलाश रहे नई राह टूटी माला के मोतियों से बिखर रहे हैं दूर हो रहे अपने धागे से जिसने सबको एक साथ बांधे रखा रुई की भांति हल्की हो रही हैं संवेदनाएँ और उड़ रही हवा के झोंके से खून अब पानी से पतला हो रहा है किसे चिंता उन बूढ़े माता- […]

कविता पद्य साहित्य

औरों की कही बताता है

सही को गलत गलत को सही बताता है नहीं वो अपनी औरों की कही बताता है दूसरों की सुनकर अपना तजुर्बा भी खोया छाछ बन चुकी है मगर वो दही बताता है मुहब्बत में हिसाब भला कौन रखता है बदल गया वो देखो खाता बही बताता है दौलत ओ शोहरत का ही ख़ुमार है चढ़ा […]

कविता पद्य साहित्य

ढल जाएगी जवानी

ढल जाएगी जवानी  दिल जवान होना चाहिए हर उम्र में हमें जीने का अरमान होना चाहिए कदम कदम पर खतरे हैं ज़िंदगी मे ए दोस्त खतरों को जो टाले वो निगहबान होना चाहिए इस मिट्टी ने न जाने कितनी खुशियाँ दी हमें मौका गर मिले वतन पर कुर्बान होना चाहिए जीभ के स्वाद की खातिर […]

कविता पद्य साहित्य

ढल रही है ये शाम, रात होने को है

ढल रही है ये शाम, रात होने को है घिर गई बदरा, बरसात होने को है जुबां खामोश रहे, तो कोई बात नहीं आंखों ही आँखों मे, बात होने को है छलक न जाए, आँखें भर गई तो              रोक लो बेकाबू, जज़्बात होने को है बरसों के बिछड़े हुए, मुस्कुरा रहे हैं उम्मीद है […]