कहानी

पत्थरों में प्राण

कल मिनाक्षी अपने शादी की सालगिरह पर बृद्धाश्रम गई । वहाँ बूढ़े बेबस और असहाय बृद्धों को देखकर रोना आ गया। वह तो उन सबसे अपने दाम्पत्य जीवन की खुशहाली के लिए दुआएं बटोरने गई थी, पर दर्द और बेचैनी से भर गई। खैर; जैसे तैसे उन्हें केक और घर के बने बिरियानी और कोफ्ते […]

लघुकथा

बढ़ना ही अविराम

घड़ी की सुई एक बजा रही थी ,नींद आँखों से कोसों दूर ।बावड़ा मन किसी निश्चय की घड़ी की तलाश में बिना थके दौड़ता ही जा रहा था । विनी से गलती कहाँ हुई थी वह तो माँ के कहने पर भाभी की जचगी पर उनके मायके भाभी और अपनी नन्हीं गुड़िया को संभालने गई […]

लघुकथा

दहलीज ( लघुकथा )

“सुनिये ना क्या तय किये आप ; मानती हूँ सारी गलती हमारी है। घर छोड़ने को मैंनें ही आपको मजबूर किया था। पर क्या करुँ कुछ बचपना कुछ बहनों के कान भरने की वज़ह से माँ बाबूजी के साथ मैं निभा नहीं पाई और आपको अपने परिवार से दूर कर दी ।” “मुझे अब इस […]

लघुकथा

मिट्टी की महक

दीपावली का दीया खरीदने आकाश बाजार में जगह जगह घुम रहा था । पर यादों में बसी मिट्टी की महक और कच्चा दीया पूरे बाजार में नहीं मिला । ओह अम्मा कितने प्यार से गीली मिट्टी की गोलियाँ बनाकर दीया बनाती थी । साथ में हर साल मिट्टी से आकाश खूब खेलता था । तीन […]

कहानी

लघुकथा – प्रकाशपुंज

“लगता है दादू की उल्टी सांस चल रही है, पापा ! डॉक्टर को खबर किजिये ।” “नहीं ; अब डॉक्टर नहीं पंडित को खबर करने का वक्त आ गया है । पता नहीं पापा के मन में कौन सी अभिलाषाएं अधूरी हैं, जिनकी वज़ह से इनके प्राण कंठगत् हैं । कितनी पीड़ाएं झेली हैं इन्होंने […]

बाल कहानी

धैर्य का पाठ ( बालकथा )

गर्मी की छूट्टियां शुरू होने वाली थी  , गोलु आज खुद को बहुत हल्का महसूस कर रहा था । ढ़ेरों उत्साह से लबालब दौड़ कर माँ के पास जाते हुए पूछा माँ— “अब मैं बड़ा हो रहा हूँ , आप चाहें तो बाजार का कोई काम मुझे भी करने दे सकती हैं ।” “हूँहहह… मेरा […]

लघुकथा

तिनकों की चुभन

उसकी प्रिय पत्रिका सुबह सुबह डाक से आ गई थी , स्वरचित लघुकथा को भी स्थान मिला था ,समीक्षक के विचार पढ़ने लगी  होठों पर मंद मंद मुस्कान तैरने लगे,  पलंग के दूसरे किनारे पर सत्या भी अखबार पढ़ रहे थे ,उन्होंने एक कप चाय की फरमाइश की । सुगंधा के मुंह से बस इतना ही […]

कविता

जीवनचक्र

सदा होठ़ों पर मुस्कान सजी रहती थी छोड़ कर चली गई  शायद मनचली थी। अल्हर बचपन करती थी अठखेलियाँ मिट गये सुहागचिन्ह आई ऐसी आँधियाँ। होठों पर सदैव सरगम सजे रहते थे वक्त लेकर आ गई अंतहीन सिसकियाँ। वक्त की शाख पर फिर फूल खिलने लगा  खोया प्यार वापस लौट कर मिलने लगा। सारा दिन […]

लघुकथा

अदृश्य संग्राम

“माँ मुझे नींद नहीं आ रही है । कोई कहानी सुनाइये ना ।” “अरे वाह ! मेरा लल्ला कहानी सुनना चाहता है ? लो अभी सुनाती हुँ , तुम अभी बहुत छोटे हो फिर मुझे बताना की कहानी कैसी लगी ।” “जी माँ ; आप पहले सुनाइये तो सही ।” “अच्छा तो फिर सुनो ।” […]

लघुकथा

कोई अपना सा

बुढ़े बीमार पति की आँखों में विछोह का दर्द देख कर वह सहम जाती थी । दिलोदिमाग पर चिंताओं का बसेरा बढ़ता ही जा रहा था । आजकल खुद से बहुत बातें करने लगी थी । कितना समझदार हो गया है मेरा मन …एक आज्ञाकारी बालक की तरह हमारी हर बात मानता है ! ज़िद […]