कहानी

लघुकथा – प्रकाशपुंज

“लगता है दादू की उल्टी सांस चल रही है, पापा ! डॉक्टर को खबर किजिये ।” “नहीं ; अब डॉक्टर नहीं पंडित को खबर करने का वक्त आ गया है । पता नहीं पापा के मन में कौन सी अभिलाषाएं अधूरी हैं, जिनकी वज़ह से इनके प्राण कंठगत् हैं । कितनी पीड़ाएं झेली हैं इन्होंने […]

बाल कहानी

धैर्य का पाठ ( बालकथा )

गर्मी की छूट्टियां शुरू होने वाली थी  , गोलु आज खुद को बहुत हल्का महसूस कर रहा था । ढ़ेरों उत्साह से लबालब दौड़ कर माँ के पास जाते हुए पूछा माँ— “अब मैं बड़ा हो रहा हूँ , आप चाहें तो बाजार का कोई काम मुझे भी करने दे सकती हैं ।” “हूँहहह… मेरा […]

लघुकथा

तिनकों की चुभन

उसकी प्रिय पत्रिका सुबह सुबह डाक से आ गई थी , स्वरचित लघुकथा को भी स्थान मिला था ,समीक्षक के विचार पढ़ने लगी  होठों पर मंद मंद मुस्कान तैरने लगे,  पलंग के दूसरे किनारे पर सत्या भी अखबार पढ़ रहे थे ,उन्होंने एक कप चाय की फरमाइश की । सुगंधा के मुंह से बस इतना ही […]

कविता

जीवनचक्र

सदा होठ़ों पर मुस्कान सजी रहती थी छोड़ कर चली गई  शायद मनचली थी। अल्हर बचपन करती थी अठखेलियाँ मिट गये सुहागचिन्ह आई ऐसी आँधियाँ। होठों पर सदैव सरगम सजे रहते थे वक्त लेकर आ गई अंतहीन सिसकियाँ। वक्त की शाख पर फिर फूल खिलने लगा  खोया प्यार वापस लौट कर मिलने लगा। सारा दिन […]

लघुकथा

अदृश्य संग्राम

“माँ मुझे नींद नहीं आ रही है । कोई कहानी सुनाइये ना ।” “अरे वाह ! मेरा लल्ला कहानी सुनना चाहता है ? लो अभी सुनाती हुँ , तुम अभी बहुत छोटे हो फिर मुझे बताना की कहानी कैसी लगी ।” “जी माँ ; आप पहले सुनाइये तो सही ।” “अच्छा तो फिर सुनो ।” […]

लघुकथा

कोई अपना सा

बुढ़े बीमार पति की आँखों में विछोह का दर्द देख कर वह सहम जाती थी । दिलोदिमाग पर चिंताओं का बसेरा बढ़ता ही जा रहा था । आजकल खुद से बहुत बातें करने लगी थी । कितना समझदार हो गया है मेरा मन …एक आज्ञाकारी बालक की तरह हमारी हर बात मानता है ! ज़िद […]

कविता

कविता – पैरों के निशान

कुदरत ने दिये कुछ  अनमोल घड़ियां  घर में बंद सारी दुनिया ढ़ूंढने लगी पैरों के निशां । सीमित संसाधन हैं फिर भी मिल रही है अपार खुशियां पति के कदम रसोई घर में परे बच्चे भी आकर मचलने लगे। नित्य नये व्यंजन बनते रात दिन स्वाद का जादू चला अनेक दिन खुशी जो अब तक […]

कहानी

कोरोना काल कहानी संस्मरण – सेवा संकल्प

शिवानी ड्यूटी पर जाने से पहले अच्छी तरह अपने हाथों एवं पैरों को ढंक ली । चेहरे पर मास्क लगा कर अपने आपको पुरी तरह तैयार कर ली । गेट पर बढ़ते कदम पति एवं बच्चों की आवाज सुन कर कुछ पल को ठिठक गये । “मत जाओ माँ ; पता नहीं आपको पुनः देख पाऊँगी […]

कविता

कविता – वक्त का दर्पण

वक्त के साथ बहुत कुछ फिर बदल जायेगा कड़ोड़ों खर्च कर गंगा निर्मल नहीं हुई बस पचास दिन में गंगा निर्मल हो गई। उसे दूषित करने वाले हाथ इतरायेंगे फिर से गंगा मैली हो जायेगी मैला आँचल होगा फिर भी माँ कहलायेगी गरीबों के नाम पर अमीर, अमीर हो जायेंगे गरीबों के हिस्से की राहत […]

लघुकथा

टूटी चूड़ियां

गंगा आरती की स्वरलहरी धाराओं को पार कर इस छोड़ से दुसरे छोड़ तक गूँज रही थी । जान्हवी देवनदी के तट पर प्रियतम से मिलने सारे बंधनों को तोड़ कर भाग आई थी । बंधन ! ना ना ! वह बंधन नहीं सर्वनाश का शिलापट्ट था । जहाँ एक बार अगर जान्हवी अपना सिर […]