गीत/नवगीत

अन्तर्द्वन्द्व

अन्तर्द्वन्द्व विचारों के उठते-गिरते ज्वारभाटे मरती संवेदनाएं सिमटते रिश्ते बेचैनियां बदहवासियां वासनाएं वर्जनाएं पल प्रतिपल मन की तरंगे उनका प्रवाह थमेगा कब कहां कैसे ? -डा.अरुण निषाद

गीतिका/ग़ज़ल

पत्थरों पर सर पटक आंसू बहाना छोड दे

पत्थरों पर सर पटक आंसू बहाना छोड दे मुफलिसी के दौर में अब मुस्कराना छोड दे ॥ तू समन्दर को बहा या कि दरिया अश्क के बदलेंगे न वो कभी चाहे जमाना छोड दे ॥ आदतें जो बन गईं वो छूटती हैं कब कहां चाहते तारों से हो कि टिमटिमाना छोड दे ॥ गर मोहब्बत […]

पुस्तक समीक्षा

प्रकृति-संरक्षण की चिन्ता : संस्कृत- काव्यों में पर्यावरण का दैव स्वरुप

परि+ आवरण शब्दों की संधि करने पर पर्यावरण शब्द बनता है, जिसका शाब्दिक अर्थ है जो परित: (चारों ओर) आवृत  किए हुए हैं ।अब प्रश्न उठता है कि कौन किसे आवृत किए हुए हैं, इसका उत्तर है समस्त जीव धारियों को अजैविक या भौतिक पदार्थ घेरे हुए हैं । जीवधारियों तथा वनस्पतियों के चारों और […]

गीतिका/ग़ज़ल

दिलों की धड़कनें अब भी तुम्हारा नाम लेती हैं

दिलों की धड़कनें अब भी तुम्हारा नाम लेती हैं तड़पने का तेरे ग़म में यही ईनाम देती हैं। अजब का इश्क इनको हो गया है नाम से तेरे न कहना मानती हैं नाम ये मुदाम लेती हैं। मुदाम=निरंतर कभी जब सोचता हूं नाम उनका गीतों में लिख दूं मेरे लिखने के पहले वो लगा विराम […]

कविता

पागल लड़की

वो पागल लड़की है जो मुझ पर मरती है बिन बोले आंखों से वह सब कुछ कहती है न जाने दिल मेरा क्यों मुझ से लड़ती है जो मुझ पर मरती है-२ वो पागल लड़की है जो मुझ पर मरती है सपनों में आती है मेरी नींद चुराती है वो नींद चुरा करके दीवाना करती […]

गीतिका/ग़ज़ल

तुम्हारा नाम लिखता हूं

तुम्हारा नाम लिखता हूं मैं सुबहो शाम लिखता हूं। तुम्हारे इन लवों को मैं गाफ़िल-ए-जाम लिखता हूं। धरा पर तुमको तो अपना मैं चारों धाम लिखता हूं। रुप की राशि तुम प्रिये मैं तुमको काम लिखता हूं। समझ लो दिल की बातें तुम ‘अरुण’ मैं पयाम लिखता हूं। — डा.अरुण निषाद

गीतिका/ग़ज़ल

अच्छी बात नहीं

छुप छुपकर पलकों को भिगोना, ये तो अच्छी बात नहीं दिल की बातें दिल में छुपाना, ये तो अच्छी बात नहीं | तेरे दरिया होने क्या, राही प्यासा रह जाए आशिक को अपने तडपाना, ये तो अच्छी बात नहीं | जब तक सांसे चलेंगी मेरी, नाम तेरा लव पर होगा तेरा इतना नखरे दिखाना, ये […]

गीतिका/ग़ज़ल

तुम्हारा नाम लिखता हूं

तुम्हारा नाम लिखता हूं मैं सुबहो शाम लिखता हूं। तुम्हारे इन लवों को मैं गाफ़िल-ए-जाम लिखता हूं। धरा पर तुमको तो अपना मैं चारों धाम लिखता हूं। रुप की राशि तुम प्रिये मैं तुमको काम लिखता हूं। समझ लो दिल की बातें तुम ‘अरुण’ मैं पयाम लिखता हूं। ©डा.अरुण निषाद

गीतिका/ग़ज़ल

प्यार

प्यार हो पास या दूर मजा देता है दुख होता है तब जब दगा देता है तुम्हारे ख़त को मैंने कई बार पढ़ा हर बार वह दिल के तार बजा देता है बिछड़ने का दर्द किसी विरही से पूछो ऐसा लगता है जैसे कोई कजा देता है हर कोई दुर्बल को सताता है जग में […]

गीतिका/ग़ज़ल

तुझे चाहने के बाद

चाहा न कुछ खुदा से, तुझे चाहने के बाद मांगा न कुछ खुदा से, तुझे मांगने के बाद किसी और चीज की, जरूरत नहीं रही पाकर के तुझको यार, तुझे मांगने के बाद तस्द्दुक है तुझ पर जां मेरी हमसफ़र मेरे जन्नत मिले या दोजख, तुझे मांगने के बाद आ जाए गर कजा भी, मुझे […]