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  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    सफ़र घर वापसी का है, मजे का है खुशी का है संभल कर नाव से उतरें. किनारा ये नदी का है मुसाफिर हूं हमारा साथ, घड़ी बस दो घड़ी का है, हमारा दिल हमारा कब, हमारा...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    मैं समझता हूँ कि ये इन्सानियत की हार है. आदमी का आदमी से जो बुरा व्यवहार है इसमे घाटे का तो कोई प्रश्न ही उठता नहीं लाभदायक इन दिनों बस धर्म का व्यापार है भीनी भीनी...