गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

जितना जी चाहे तेरा यार सता ले मुझको। अपने सीने से मगर आज लगा ले मुझको। बढ़ गया उसकी जफ़ाओं का सितम यूँ मुझ पर चैन दे अब तो ख़ुदाया या उठा ले मुझको । मन के सहरा में कहां से ये समंदर आया, मौजे-ग़म कौनसी हर रोज उछाले मुझको। मैं तुम्हारी हूँ तुम्हारी ही […]

कविता

सात वर्ण पिरामिड

1 वो फूंदी लँगड़ी कंचे,झूले आँख मिचौली छूट गए सब अपने हमझोली 2 लो फिर हमको घेर लिया उन यादों ने थी जो हमारे बचपन का हिस्सा 3 मैं तुम पीपल बरगद ऊँची छलाँगें सब छूट गए सिर्फ़ यादें उनकी 4 तू बता दोबारा मिला तुझे वो बचपन जो छूट गया था उम्र की चौखट […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

इतराये बादल। छुप जाये बादल।। रो रो कर आँसू, ढलकाये बादल। प्यासी देख धरा झट छाये बादल। आज जुल्म इतना, क्यूँ ढाये बादल। कुछ यादों के हैं, ज्यूँ साये बादल। सावन झूले पे, बलखाये बादल। संग हवा के क्यों उड़ जाये बादल। धा धा धिर धिर धा, कुछ गाये बादल। झुक-झुक चलते हैं, शरमाये बादल। […]

बाल कविता

बचपन की यादों के दोहे

1 गीली डंडा,खेलती, टोली चलती साथ। राजा बाजा खेलते,पकड़B सखा का हाथ ।। 2 आज कहीं पर मिल गया, बचपन का यह राग। घी, गुड़,में घुलता हुआ, अपनों का अनुराग।। 3 आज जरा से रख दिये, हमने पीछे पाँव। धूल सना बचपन मिला,प्यार सना सा गांव।। 4 हमने हर पल को जिया, बचपन में भरपूर। […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक

अंदर बाहर आग लगी है घर चौबारे सुलग रहे ये हालात सुधारें कैसे कैसे कोई विलग रहे टुकड़ा-टुकड़ा टूटा भारत टूटी उसकी ताक़त भी जांत-धर्म के झगड़े में क्योंभाई-भाई अलग रहे पहले मुझको फूलों जैसा तेरा सँग जो प्यारा था धीरे-धीरे जाना मैंने तेरा रूख तो न्यारा था मीठी-मीठी बातें तेरी सबको ही फुसलाती थी […]

गीत/नवगीत

गीत : तुम देश का संबल बनो

नव पीढी तुम इस देश का संबल बनो माहौल कीचड़ है तो क्या तुम कमल बनो जो जलना चाहता है उसके लिए अंगार बनो चैन-सुकूं जो चाहे उसके लिए जलधार बनो चंड-प्रचंड ज्वाला कहीं, कहीं गंगाजल बनो नव पीढी तुम ……. माहौल कीचड़ …….. वतन की खुशहाली तेरी आँखों का सपन हो दिल में हो […]

कविता

कविता

बर्फ़ हुए लम्हों को फिर पिघलाने लगी है तेरे ख़यालों की धूप डर है कंही फिर ना बह पड़े ख्वाहिशों की वो नदी जो इक दिन गुम हो गई थी जुदाई के सहरा में गर ऐसा हुआ तो दर्द की वो सारी चट्टानें फिर निकल आएंगी बाहर जो दबी है तो अभी तो रिश्तों की […]

कविता

कविता

तुम अपने क़दमों को रोको जरा उतर रहे हैं जो मेरे दिल में अहिस्ता-अहिस्ता आईने भी अब नहीं दिखाते मुझे अक्स मेरा अज़ब सी उमंगों में डूब रहा है दिल लबों पर तैरते हैं इन दिनों बैलोस नगमें तेरे ख़यालों से ताल मिलाते धीरे-धीरे मुझसे दूर हो रही मैं उतर रहे मुझमे तुम अहिस्ता-अहिस्ता आशा […]

कविता

रिक्त नहीं थी मैं

तुमने कहा तुम अपना दर्द मुझे दो मैं उसें ख़ुशी मैं बदल दूंगा मान गई मैं तुमने कहा तुम अपने आँसूं मुझे दे दो मैं उसें हंसीं मैं बदल दूंगा मान गई मैं तुमने कहा तुम अपनी दरकन मुझे दो उसें जुड़ाव में बदल दूंगा मान गई मैं तुमने कहा तुम अपनी रिक्तता मुझे दो […]

कविता

कविता : मन

कतरा-कतरा पिघलने लगा मन अरसे से जमी ख्वाहिशों को मिली जब से कुनकुनी धूप तेरे साए की तनहाइयों की कंक्रीट पर झरने लगे मिलन के मोगरा देख जरा कितना ऊपर उठ गया खुशियों का गुलमोहर बासी चांदनी में फिर घुली केशरिया महक तेरे ख्वाबों की तैरने लगे रूह की झील में प्रेम भरे हर्फ़ कोरे-कोरे […]