गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

हर क़दम एक डर सा लगता है आदमी क्यूं शरर सा लगता है डर अंधेरों से क्यूं रहे मुझको उसका चेहरा सहर सा लगता है इसलिए रखते हैं ख़बर उसकी वो हमें बेख़बर सा लगता है उनको साया नसीब हो मौला जिनको पल दोपहर सा लगता है है जो साया सदा बुजुर्गो का एक घनेरा […]

मुक्तक/दोहा

कुछ मुक्तक

सहरा ए दिल से नदी कोई निकल न जाये न मिलाओ तुम निगाहें कहीं दिल मचल न जाये इतना न नाज दिखा इस इंतजार को तू तिरे आने तक कहीं मौसम बदल न जाये मिरी ग़जलों में तिरी याद की बहर क्यों है। हर तरफ तेरा ही जलवा तिरा असर क्यों है। रात के माथे […]

कविता

सुंदर फूल : कुछ सवाल-जवाब

इन सुंदर फूलों को कौन खिलाता है ? प्रकृति इन सुंदर फूलों में कौन रंग भरता हैं? प्रकृति इन सुंदर फूलों में कौन खुशबू डालता हैं? प्रकृति इन फूलों को तोड़ता कौन है ? प्रकृति हजारों सवालों का एक ही जवाब प्रकृति पंखुड़ियों और पराग-कणों के गुच्छे की तरह सूरज मधुमक्खियाँ या हवा फूलों से […]

कविता

पिता चले गए

पिता चले गए साथ अपने ले गए ज्यों सारी ऋतुएं खुशहाली ,तीज त्यौंहार छोड़ गए साए में अनमने उम्र काटते दिन पूजा घर से अब नहीं उठती धूप,अगरबत्ती की खुशबू न ही गूंजता शंखनाद नहीं उच्चारित होते महामृत्युंजय के जाप नब्जों में ठहर गई वो तमाम दुआएं नित करती थी जो बेटियां उनकी सलामती के […]

सामाजिक

आदिवासी परम्पराएं “दापा प्रथा “

पतिदेव की पोस्टिंग 13 बरस पहले उदयपुर से तक़रीबन 110km दूर कोटड़ा आदिवासी बहुल क्षेत्र में रही। उन दो बरसों में आदिवासी जीवन को बहुत करीब से जानने समझने का मौका मिला। गुजरात की सीमा से सटा साबरमती नदी के किनारे बसा यह गाँव प्राकृतिक सौन्दर्य का अनूठा खजाना है। बांस , खजूर, महुवा, आम […]

कहानी

कहानी ” बेबस बुढ़ापा “

उमा के कॉलेज की छुट्टी आज साढे चार बजे ही हो गई। वैसे तो कॉलेज का समय एक से छः बजे तक है, परन्तु आज कॉलेज के ट्रस्टी दीनानाथ जी का आकस्मिक निधन हो जाने की वजह से छुट्टी डेढ घण्टा पहले ही कर दी गई। यूं तो यह खबर बहुत दुःखद थी, पर उमा […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

आओ धर्म-धर्म खेलें

इन दिनों धर्म को लेकर खेली जा रही राजनीती व सारे दाँव पेच गुजरी 21 सदियों का शायद सबसे घिनोना खेल है  जिस भी समाज,धर्म, मनुष्य को देखो अपने-अपने धर्म का एक झंडा बहुत गहराई से गाड़ने की कोशिश कर रहा है । जैसे अचानक इन्ही दिनों उनका धर्म समूल नष्ट हो जाएगा जो उसने धर्म-धर्म […]

हास्य व्यंग्य

हास्य-व्यंग्य : आस्तीन के सांप

मुझे एक बात समझ में नहीं आई. ये जो आस्तीन के सांप होते हैं उनका आकार कितना होता है … ? ऐसा इसलिए पूछ रही हूँ क्योंकि आजकल आस्तीन बहुत छोटी- छोटी सी होती है, बल्कि नाम रह गया आस्तीनों का।आस्तीन के नाम पे अक्सर हम महिलाओं की पोशाकों पर एक छोटा सा छज्जा मिलता […]

हास्य व्यंग्य

हास्य-व्यंग्य : पलकां में बंद कर राखूंली…

एक गाना अक्सर सुनने में आता है । थ्हांने काजलियौ बणाल्यूं… म्हारै नैणा में रमाल्यूं राज पलकां में बंद कर राखूंली ….. हो …. हो… बहुत ही ख़ूबसूरत गीत है। लता जी व मुकेश जी की आवाज़ में गाया हुआ मेरा पसंदीदा गीत होने के कारण मैं भी अक्सर गुनगुनाती रहती हूँ… एक दिन यूँ ही […]