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  • कहानी – अंतराल

    कहानी – अंतराल

    उम्र के आठवें दशक में खड़ी रामकली, आँखें फाड़े अपने प्रौढ़ पुत्र को देख रही थी। वह सोच रही थी, ‘क्या ये उसी नथामल का पुत्र है जिसने विभाजन के कारण भूखे-प्यासे रहने पर भी किसी...

  • कहानी – विकलांग

    कहानी – विकलांग

    काठगोदाम से बरेली जाने वाले रेल-मार्ग पर ‘किच्छा’ एक छोटा-सा रेलवे स्टेशन है, काठगोदाम लाइन के लालकुआँ जंकशन से इस लाइन पर बहुत सारी गाड़ियाँ आती-जाती हैं। खास तौर पर बरेली, मथुरा, लखनऊ आदि मार्गों की गाड़ियों का तो...

  • महिलाएँ और भ्रूण हत्या

    महिलाएँ और भ्रूण हत्या

    नारी के साथ जुड़ा शब्द ‘‘माँ’’ सारी सृष्टि को अपने अंक में समेटने की क्षमता रखता है। माँ सृष्टा है, जन्म दात्री है, ममता और दुलार का भण्डार है, किन्तु इसी ममता की छाँव के साथ...

  • परम्परा

    परम्परा

    ‘‘देखिए चाचा जी, आप ही समझाइए न बाबू जी को। हर रोज़ कामना से किसी न किसी बात पर ठान लेते हैं और निपटना मुझे पड़ता है। दफ्तर से लौटते ही उसका रोना झेला नहीं जाता।’’ ‘‘बेटा, कामना...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    हमें ललकार सुनकर चाहिए हुशियार हो जाना नहीं सोने का मौका साथियो बेदार हो जाना ये हिन्दुस्तान की मिट्टी भले चन्दन सी शीतल है बहुत मुमकिन है इसका वक्त पर अंगार हो जाना उठे जब सरहदों...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    सावनी बौछार हो इक ग़म भुलाने के लिए आम का भी पेड़ हो झूला झुलाने के लिए रात भर के जागरण से टूटती इस देह को इक ज़रा सी है उफक, अब गुनगुनाने के लिए जम...

  • हिमाचल के लोकगीतों में ‘लामण’

    हिमाचल के लोकगीतों में ‘लामण’

    गीत का सीधा सम्बंध गेयता से है, कण्ठ से है। गीत! जो उल्लास, प्रसन्नता और उमंग का ही प्रतीक नहीं है, दुःख और चिंता का भी प्रतीक होते हैं।अध्यात्म और वैराग्य के भी, प्रेम और विरक्ति के...

  • संस्मरण         रसूूलपुर की गंगा

    संस्मरण रसूूलपुर की गंगा

      जी हाँ! मैं रसूलपुर में स्थापित महादेवी वर्मा की साहित्यकार संसद की ही बात कर रही हूँ। मेरे लिए वह क्षण विलक्षण ही था जिस क्षण मैंने वहाँ कविता पाठ किया, परन्तु वहाँ तक पहुँचने...

  • कहानी : छोटी सी ख़ुशी

    कहानी : छोटी सी ख़ुशी

    कभी-कभी जीवन ऐसे करिश्में दिखाता है कि आँखें बस देखती ही रह जाती हैं और अकल दंग। डाॅ. रंजन की परिस्थिति भी कुछ ऐसी ही हो गई थी। वह जीवन के रंगमंच पर नियति के मदारी...

  • ग़ज़ल

    ग़ज़ल

    कितनी गहरी झीलें हैं कुछ ग़म की तफ़सीलें हैं छेड़ न उसके ज़ख़्मों को रूह में गहरी कीलें हैं बच्चों की हंसती आँखें या रौशन कंदीलें हैं दो पल तू भी हंस के देख सुख की...