भजन/भावगीत

शुभ सभी संचार दे

अखिलेश्वरी, भुवनेश्वरी, सर्वेश्वरी माँ शारदे सम्बल हमें दे लेखनी का ज्ञान का आधार दे हे शुभ्र वसना तू सदा रहना मेरे संग-साथ ही वीणा की ध्वनि कानों में हो मसि लेखनी हो सहचरी शत् जन्म लूँ भारत में मैं, इतना मुझे अधिकार दे जहाँ वेद गाते यश तेरा होता है गान कुरान का वह देश […]

लघुकथा

सुरक्षा का प्रश्न

सुबह से घर में बवाल मचा हुआ था। माँ के सन्दूक से सारे गहने किसी ने निकाल लिए थे। घर में बेटा बहू, बेटी और माँ चार ही प्राणी थे तो जाहिर है कि यह काम इन्हीं में से किसी का है, पर कोई बता भी तो नहीं रहा था। बेटे के कारोबार में शायद […]

कहानी

बारह साल की वह लड़की

वह हवेली इतनी बड़ी थी कि पूरा दिन घूमते रहो तब कहीं जाकर पूरी देख सकते हो, हवेली क्या थी पूरा किला था। जिस हिस्से में वे लोग रहते थे वह तो जेल जैसी ऊँची दीवारों से घिरा हुआ था। रहने वाले बस तीन ही प्राणी थे। बारह साल की सतविन्दर और उसके माता-पिता सरदार […]

कहानी

कहानी – अंतराल

उम्र के आठवें दशक में खड़ी रामकली, आँखें फाड़े अपने प्रौढ़ पुत्र को देख रही थी। वह सोच रही थी, ‘क्या ये उसी नथामल का पुत्र है जिसने विभाजन के कारण भूखे-प्यासे रहने पर भी किसी की दया नहीं स्वीकारी थी, किसी के आगे हाथ नहीं फैलाया था? पर सच तो यही था, इससे इनकार […]

कहानी

कहानी – विकलांग

काठगोदाम से बरेली जाने वाले रेल-मार्ग पर ‘किच्छा’ एक छोटा-सा रेलवे स्टेशन है, काठगोदाम लाइन के लालकुआँ जंकशन से इस लाइन पर बहुत सारी गाड़ियाँ आती-जाती हैं। खास तौर पर बरेली, मथुरा, लखनऊ आदि मार्गों की गाड़ियों का तो दिन भर आना-जाना रहता है। उस दिन इस छोटे से रेलवे स्टेशन पर कुछ अधिक ही भीड़ थी, तरुणा को […]

सामाजिक

महिलाएँ और भ्रूण हत्या

नारी के साथ जुड़ा शब्द ‘‘माँ’’ सारी सृष्टि को अपने अंक में समेटने की क्षमता रखता है। माँ सृष्टा है, जन्म दात्री है, ममता और दुलार का भण्डार है, किन्तु इसी ममता की छाँव के साथ जब हत्या जैसा क्रूर शब्द जुड़ जाता है (वह भी भ्रूण हत्या) तो अनजाने, अनचाहे मुँह का स्वाद कसैला […]

लघुकथा

परम्परा

‘‘देखिए चाचा जी, आप ही समझाइए न बाबू जी को। हर रोज़ कामना से किसी न किसी बात पर ठान लेते हैं और निपटना मुझे पड़ता है। दफ्तर से लौटते ही उसका रोना झेला नहीं जाता।’’ ‘‘बेटा, कामना को भी तो समझाओ कि वह बड़ों से सभ्यता से बात किया करे।’’ ‘‘चाचा जी, कामना नए ज़माने की […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

हमें ललकार सुनकर चाहिए हुशियार हो जाना नहीं सोने का मौका साथियो बेदार हो जाना ये हिन्दुस्तान की मिट्टी भले चन्दन सी शीतल है बहुत मुमकिन है इसका वक्त पर अंगार हो जाना उठे जब सरहदों से दोस्तो, इक शोर खतरे का तो लाज़िम है यहाँ हरएक गुल का ख़ार होजाना खनकती चूड़ियों को रख […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

सावनी बौछार हो इक ग़म भुलाने के लिए आम का भी पेड़ हो झूला झुलाने के लिए रात भर के जागरण से टूटती इस देह को इक ज़रा सी है उफक, अब गुनगुनाने के लिए जम गया सीने पे जो पत्थर ग़मों का दोस्तो आप का हो इक इशारा ही हिलाने के लिए उस गली […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

हिमाचल के लोकगीतों में ‘लामण’

गीत का सीधा सम्बंध गेयता से है, कण्ठ से है। गीत! जो उल्लास, प्रसन्नता और उमंग का ही प्रतीक नहीं है, दुःख और चिंता का भी प्रतीक होते हैं।अध्यात्म और वैराग्य के भी, प्रेम और विरक्ति के भी। गीत अनपढ़ कंठों सेभी प्रस्फुटित होते हैं और सधे-मंजे रागों से भी सुसज्ति होते हैं। भरपूर वाद्ययंत्रों का सहारा […]