संस्मरण

संस्मरण रसूूलपुर की गंगा

  जी हाँ! मैं रसूलपुर में स्थापित महादेवी वर्मा की साहित्यकार संसद की ही बात कर रही हूँ। मेरे लिए वह क्षण विलक्षण ही था जिस क्षण मैंने वहाँ कविता पाठ किया, परन्तु वहाँ तक पहुँचने के लिए मुझे साहित्य सम्मेलन प्रयाग के प्रधानमंत्री श्रीधर शास्त्री जी का कोपभाजन बनना पड़ा वह भी एक कभी […]

कहानी

कहानी : छोटी सी ख़ुशी

कभी-कभी जीवन ऐसे करिश्में दिखाता है कि आँखें बस देखती ही रह जाती हैं और अकल दंग। डाॅ. रंजन की परिस्थिति भी कुछ ऐसी ही हो गई थी। वह जीवन के रंगमंच पर नियति के मदारी के हाथों का खिलौना बना ताक-धिनाधिन नाच रहा था। वह रोहतक के मानसिक चिकित्सक डाॅ. राजीव डोगरा से ममता […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

कितनी गहरी झीलें हैं कुछ ग़म की तफ़सीलें हैं छेड़ न उसके ज़ख़्मों को रूह में गहरी कीलें हैं बच्चों की हंसती आँखें या रौशन कंदीलें हैं दो पल तू भी हंस के देख सुख की बहुत सबीलें हैं ग़म यूँ उथले कर जैसे दीवाली की खीलें हैं रात-रात भर जगने की पुख़्ता बहुत दलीलें […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

गुज़र जाएगी यह शब हौसला रख सुबह के वासते दर को खुला रख सज़ा दे-दे या खुद को माफ़ करदे अंधेरे में न तू यूँ फैसला रख वो मुंसिफ़ कुछ नहीं सुनता किसी की न उसके पास अपना मामला रख कई मज़लूम होंगे इस जहाँ में सभी के वासते लब पर दुआ रख न रो-रो […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

क्या लेना है नाम कमाकर अच्छे हैं गुमनाम मियाँ नाम कमाने के चक्कर में हुए व्यर्थ बदनाम मियाँ कहाँ मुरादें मिलती हैं हरइक को दुनिया में आकर अक्सर जाने वालों को जाते देखा नाकाम मियाँ ताक पे रक्खो रिश्तों को जजबात झोंक दो चूल्हे में दिल के मोल पे बिकने वाले मुफ्त़ हुए नीलाम मियाँ […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

बात दिल की जहाँ-जहाँ रखिए एक परदा भी दरम्याँ रखिए घोंसले जब बुने हैं काँटों से क्यों बचाकर हथेलियाँ रखिए हौसले अपने आज़माने को हर कदम साथ आँधियाँ रखिए मौसमों से नज़र मिलाने को सर पे कोई न आसमाँ रखिए हर जगह नाम उनका लिक्खा है फिक्र है दासतां कहाँ रखिए माया-ए-ग़म छुपाएँ किस-किस से […]

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

बौद्ध धर्म हिन्दु मत के कितना निकट कितना दूर

हिमालय की निचली तराई के कपिल वस्तु राजघराने में उत्पन्न बालक का नाम सिद्धार्थ रखा गया। गौतम नाम उनके प्राचीन गौतम वंश के कारण मिला। गौतम (सिद्धार्थ) को ‘बुद्ध’ नाम उस बोध के कारण प्राप्त हुआ जिससे उसे तत्व-दृष्टि प्राप्त हुई। सुखमय जीवन की लालसा में यौवन काल ही में राजप्रसाद के सुखों का त्याग करके उन्होंने तत्कालीन प्रथा […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

मिरे मकान में हर सिम्त खिड़कियाँ रक्खीं हरेक ताक पे फिर उसने बिजलियाँ रक्खीं हुनर को उसके बार-बार मरहबा कहिए चमन की शाख़-शाख़ जिसने आँधियाँ रक्खीं बनाए जिस्म बशर के धड़कते दिल रक्खे न जाने उनमें जुबानें कहाँ-कहाँ रक्खीं आँख को अश्क के नूरानि मोतियों से भरा मरहबा! दौलतें पलकों तले निहाँ रक्खीं दयार-ए-दिल को […]