कविता

ईमान

क्यों डिगाऊं? ईमान अपना चंद पैसे लेकर मैं हिंद का पुजारी हूँ हिंदुस्तानी हूँ! मेरे ईमान पर मुझे सौपा है लड़ना दुश्मनों से डटे रहना सख्त सीमा पर! मेरे ईमान पर मुझे मिला है सम्मान प्यार लोगों का चूँकि मेरे अंदर बसा है शूरवीर,खून ईमान का! मेरे ईमान पर कांपते थरथराते दुश्मन रोते विलविलाते दुश्मन […]

कविता

राख हथेली पर

क्यों? राख हथेली पर रखूँ सवाल करूँ  हल्के फुल्के उलझे अपनों से,  अभी राख चंद मिनटों में  उड़ जायेगी  या घुल जायेगी  पानी में शराफत भरी बातें  छोड़ विलुप्त हो जायेगी  यूँही  खामोश,  मुझे उलझाकर  शायद आज या अभी अभी। 

कविता

पानी नहीं है

प्यासा गला रूठा बर्तन खाली पानी नहीं है तमन्ना जगी है पी लूँ दो घूँट पर उदासीनता सामने हाथ पसारती मुँह बनाती खड़ी है जैसे लिए लोटा पहले से। क्या करूँ? क्या सोचूँ? किसे बोलूँ? यहाँ सारे प्यासे है सड़क पर बैठे हैं हाँफते, चेहरा लटकाऐ। मैं खामोश मन साधे सो गया यूँही सपना समझकर […]

कविता

शायद बेनाम हो

तुम कहाँ हो? खोये खोये रहते हो क्या तुम्हारा कोई वजूद है? या हासिल करना चाहते हो कुछ नया। जिंदगी किसकी है किसके नाम कब बनती? कब सुधरती है? सब पता है तुम्हें किंतु वैसे ही झल्लाते हो अपनी ही तानते हो। वक्त को मुट्ठी में दबाकर बतियाना चाहते हो पता नहीं तुम कौन हो? […]

कविता

चल दिया

खाया पिया चल दिया पूछा, क्यों भाई क्या हुआ? क्यों भोजन से मुँह फेर लिया? क्यों थाली को खिसका दिया। वह बोला, भोजन बेकार है इसे गधे भी नहीं खा सकते इंसान की क्या औकात है? आप फिर भी इसे खाते हो कैसे इंसान हो। मन में कुछ विचारों ने उथल पुथल की सच कहते […]

कविता

मैं बीज हूँ

मैं बीज हूँ दबा हूँ मिट्टी में ॉछुपा बैठा हूँ देखता इर्दगिर्द। मैं सदा सादा जीवन जीता हूँ भरता हूँ झोली गरीबों की सुधारता हूँ बिगड़े हालात घरों के मेरे रूप अनेक है आप जानते पहचानते हो मैं कैसा हूँ? कहाँ हूँ? किस हाल में हूँ आप खुश मैं भी खुश हूँ अच्छा भला हूँ।

कविता

बुझा बुझा जीवन है

बुझा बुझा जीवन है शायद अपना आशा निराशा है मन में कटु जटिलता पनपती है संघर्ष भरे दौर है दीप जलते बुझते है उगती है कठिनाई हर मोड़ पर राह पर मुसीबत ढपली बजाती है। क्या करूँ? क्या न करूँ? मुझे लगता है सब बेबाक, व्यर्थ सपनों सा अंधकार सा इसलिए यूँही बैठ जाता हूँ […]

कविता

धन्य है

धन्य है जीवन अद्भुत रचना है अमूल्य हर इंसान है महारत्न है दुनिया में। इस रत्न की पहचान कौन करता है? जिसे ज्ञान हो वही परखता है वरना अज्ञानी बेकार समझता है नष्ट कर देता है हौले हौले जैसे घड़ा से टपकता पानी।

कविता

क्या हुआ आपको

क्या हुआ? क्यों सड़क पर? पैर फैलाये बैठे हो क्या कोई तकलीफ है? या दुख सिर पर सवार है बताओ शायद मैं कुछ मदद करूँ किंतु इंसान मुँह फेर रोने लगा हौले हौले सिसकने लगा खड़ा हो चलने लगा कहने लगा नहीं कोई बात न दुख का पहाड़ ये मेरा शौक है मैं शौकीन हूँ […]