कविता

हम और किस्मत

हम सोये सोई किस्मत हम जागे जागी किस्मत हम रोये रोई किस्मत हम हँसे खिलखिला उठी किस्मत क्या खूब ? सम्बन्ध किस्मत का हम से है , क्योंकि हम खड़े ? अपने बल पर किस्मत खड़ी हो चल दी आगे…आगे… कर इशारे राह बनाती मंजिल दिखाती !

हाइकु/सेदोका

हाइकू

घर बाहर हो रहा घमासान रो रहे बच्चे I भूखे है पेट माँग रहे है भीख खाते ठोकर I सड़क जाम आ गया अभिनेता दबते लोग I देश में पैसा फिर भी मरे लोग कैसा इंसाफ I पीते शराब नशा सिर चढ़ता करते दंगा I पढ़े हैं लोग समझदार घर मन क्रूर क्यों ?

कविता

लगती हो माँ सी तुम

मिटटी की दीवारों पर न जाने क्या लिखती हो ? कभी जडती हो शब्द अनेकों कभी शब्द व्यंजना करती हो कैसी हो ? तुम कौन हो ? परिचय अपना क्यों नहीं देती हो ? पर लगती हो माँ सी तुम मुझे माँ की मूरत दिखती हो I किन्तु अधर तुम्हारे क्यों काँप रहे ? क्यों […]

कविता

बाज के चंगुल में

बाज के चंगुल में फँसी चिड़िया को सब व्यर्थ मृत्यु का झंझावात नजर आया किन्तु क्या ? फड़फड़ाने के सिवा मन विचलित उपाय में लिप्त धीरे से चिड़िया ने बाज के पंजे पर चौंच का नुकीला प्रहार किया बाज हताश ! छोड़ चिड़िया उड़ उठा लंबी साँसे बारम्बार निकाल जंगल की ओर वीराने में I

कविता

जब देखी

जब देखी मैंने रोती बिलखती माँ को लुढ़कते आँसू आँखों को I खून बौखला उठा मेरा ऑंखें क्रोधित उमड़ती ज्वाला काश ! धम्म उठा पटल दूँ उनको जो हर रहे चैन,अमन दे रहे पीड़ा माँ को I

कविता

तुम्हारी निशानी

माँ तुम नहीं पर तुम्हारी निशानी मुझे सदा याद दिलाती रहेगी I मैंने संभाल सजा ली है किताबों में जब अहसास, याद आती है माँ तुम्हारी निशानी देख अतीत में खोता चला जाता हूँ करता क्रीड़ाएँ आँगन में I निशानी माँ बाप की प्यारी औलादों को रख लेनी चाहिए वक्त न जाने कब,कहाँ,कैसे ? क्या […]

कविता

शब्द बनकर रह गए हैं

मिटटी के चूल्हे  पर  हांड़ी चढ़ाना लकड़ी की आग पर  खाना पकाना  धुएँ से  माँ की आँखों से  आँसुओं का गिरना  खीजना,चिल्लाना, किताबों में  कहानियाँ बनकर, लोगों की जुबान पर  शब्द बनकर रह गए हैं  I  फुलवारियों में  तितलियों का आना- जाना  कोयल का कूकना रात में  जुगनू का चमकना  अट्टाहास यूँहीं  फिसल कर गिरना  […]

कविता

कविता : कैसे लाँघोगी

बंद खिड़कियाँ,दरवाजे परदे नींद में ऊंगते दीवाल पर टिकी मूर्ति तुम्हारी कैसे लाँघोगी देहरी दुर्गम राहें कठिनता हरदम चारों ओर तबाही मचाती बौखलातीं नजरें लोगों की तपी हुई अंगीठी में I धुँआ अंधाधुंध परछाई कहाँ,कैसे ? खोज पाओगी अपनी निर्मल I औरत चर्चाएँ तुम्हारी अनेकों पुराणों में ढूढों जरा सोचो बलशाली बनो अतीत बदल डालो […]

कविता

कविता : स्त्री तू निर्बल क्यों ?

स्त्री तू निर्बल क्यों ? क्यों जज्वा तेरा ? शून्य सा खामोश बिखरा-बिखरा मैदानों में I तेरी हथेली पर वही लकीरें खिचीं हुई संघर्ष,अटल विश्वास कीं अन्यथा कहाँ दाना पानी नसीब में I ऊर्जा,उमस सुख  दुःख बिद्यमान सारे तुझमें उठ पाँव रख, देख अंत: दीवारों में जगमगा उठेंगीं खुशियाँ अनेकों होती प्रफुल्लित मस्तमौला सी I