कविता

लोग मिलते हैं

लोग मिलते हैं मिलते ही रहते है यह मिलने-जुलने की परंपरा जीवन-पर्यन्त चलता ही रहता है बस मिलने वालों के समय-समय पर चेहरे बदलते रहते हैं कुछ तो मिलकर कहीं खो जाते हैं कभी मुलाकात नहीं होती दुबारा यूँ कह लें यह मुलाकात भीड़ जैसी है पर होते हैं कुछ लोग एकांत और शांत झील […]

कविता

कभी यूं भी

कभी यूँ भी कभी तुम खुद चले आना कभी तुम मुझे बुला लेना फुरसत के उन पलों में तन्हा ना तुम कभी रहना चाहो तो याद कर लेना या फिर दिल कहीं और लगा लेना कुछ बातें तो आज भी अधूरी ही हैं तेरे बिना मिले अगर पूरी कर लेना कभी तुम खुद चले आना […]

कविता

उदास लड़की

उसकी उदासियां मेरे मुस्कुराते चेहरे को टोक रही थी और उसे देखकर मैं भी उदास हो गई ओह, कितना दर्द था उसकी आँखों में जैसे एक चंचल नदी बहते-बहते अचानक ठहर गई हो इतने बड़े घर में सब कुछ तो था पर कमी थी मुस्कुराहट की उन खुशियों की जो किसी मकान को घर बनाता […]

सामाजिक

नीव

कितना कुछ बदल चुका है आज समाज में, पर… इतनी जल्दी इतना परिवर्तन आएगा, कभी सोचा न था। याद आता है मुझे बचपन से लेकर युवावस्था की वो बातें, शरारतें जो हम बेफिक्री से किया करते थे। आस-पड़ोस के रहने वाले लोग चाची, मामी, दादी, फुआ हुआ करते थे, जिनके घर में बिना किसी रोक-टोक […]

कविता

तुम्हारी यादें सहज नहीं होती

सुनो ! तुम्हारी यादें कहाँ सहज होती है जो याद आएं और भूल जाएं ये तो तूफान और सुनामी लाती है और क्या ! असहज कर देती है मुझे टूटने लग जाता है फिर मेरा वास्तविकता से नाता…. भूल जाती हूँ पलभर के लिए सबकुछ बस तुम ही तुम होते नजर में भावनाएं जुड़ने लग […]

कविता

सानिध्य

इन दिनों कुछ खास एहसासों का सानिध्य मन को रोमांचित कर रहा कुछ दर्द जो जम गए थे आंखों में काजल की तरह खुशियों की छलकती बूंदों संग बह चली है कहीं मर मिटने के लिए आह ! आज फिर भरेगी उदास आंखें आइकोनिक काजल की तीरे नजर…. जिसमें डूबकर जी लेना चाहता है किसी […]

कविता

मौन

मौन कतई चुप्पी नहीं मौन तो एकाग्रता है ज्ञानेन्द्रियों में तालमेल बिठाने का इन्द्रियों को संकेंद्रित कर आंतरिक शक्तियों को जाग्रत करना मन, मौन और मनन आंतरिक चेतना में संवाद असंभव कार्य को भी संभव करना मन को साधना मनन का आरंभ है शून्य में प्रवाहित तरंगीय शक्ति को मानव शरीर मे संचित करना वास्तविक […]

कविता

मन का एक कोना

सुनो ! मन का एक कोना जहां तुम चुपके से आकर बस गए थे और मैंने भी खोल दिए थे द्वार बिना किसी परवाह के एक विश्वास तो तुमने थमाया था मेरे जज्बातों को और जिनसे लिपटकर न जाने कितने मेरे भीतर नन्हें- नन्हें एहसासों की कलियां खिली थी। सुनो ! जानते हो ये पूस […]

लघुकथा

उलझन

सुनैना अलमारी में रखे कपड़े को तह लगा रही थी बाहर तेज बारिश भी हो रही थी बेटा निखिल लैपटॉप पर पढाई कर रहा था। तभी फोन की घण्टी बजी… सुनैना ने पहली रिंग में ही उठा ली हाय! सुनैना कैसी है यार उधर से आवाज आई…. तुम कौन?? पहचानी नहीं ओह, यार तू मेरा […]