गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

उसके दर से होकर बेकरार चले एक बेवफा से करके प्यार चले तन्हाई में गम को उतार चले भीड़ से खुद को निकाल चले साँसों से लेकर लम्हें कुछ उधार चले अपने दामन की खुशियां तुझपर बार चले तुझसे करके मुहब्बत अपनी दुनिया संवार चले आंखों में अश्कों की चुभन सम्भाल चले गिरते संभलते खाकर […]

गीतिका/ग़ज़ल

कब से…..

ढूंढता रहा मैं जाने तुम्हें कब से भटकता रहा अनजाने से कब से बड़ी मन्नतों से पाया है तुम्हें रब से दी है जगह पहला तुम्हें सब से बना ली हैं दूरियां मैंने सब से बसी हो दिल में मेरे जब से ख्वाबों में बसाया है तुम्हें जब से जिंदगी हसीन हुई है तब से […]

कविता

खबरें

झंझोड़ती झकझोरती खबरें कुछ हकीकत कुछ बनावटी प्रभाव तो सभी है डालती कोई मसालों में लपेट रहा कोई चुनावी रंग भर रहा तो कोई सनसनी बना के परोस रहा न सच से वास्ता न सम्वेदनाओं से रिश्ता कोई टीआरपी का खेल है सारा चटपटी ख़बरों का नाश्ता इनका तो तडकों से है वास्ता हिंसक वारदातों […]

कविता

महामारी

माहमारी 21वीं सदी में भी ये बेचारगी हाय! ये कैसी बेबसी आज की ये आग लगाई किसने गलियां सूनी, सड़कें सूनी सूना है शहर और संसार शून्य में आज भटक रहा हर आम और खास इंसान मजबूरी में पड़े हैं आज सब दूर दूर खड़े हैं कल कारखाने सब ठप पड़े हैं विकास और नित […]

गीतिका/ग़ज़ल

उसके दर से…..

उसके दर से होकर बेकरार चले एक बेवफा से करके प्यार चले तन्हाई में गम को उतार चले भीड़ से खुद को निकाल चले साँसों से लेकर लम्हें कुछ उधार चले अपने दामन की खुशियां तुझपर बार चले तुझसे करके मुहब्बत अपनी दुनिया संवार चले आंखों में अश्कों की चुभन सम्भाल चले गिरते संभलते खाकर […]

लघुकथा

प्रेम के रंग

राहुल सरकारी दफ्तर में नौकरी करते है और दिसम्बर का अंतिम महीना चल रहा था राहुल की कुछ छुट्टियां बची हुई थी तो सोचा कि चलो ले लेते हैं वर्ना छुटियाँ बर्बाद हो जाएगी…. और इसी बहाने परिवार के साथ पूरे दिन साथ रहने का मौका भी मिलेगा खाना पीना और मस्ती राहुल ने पूरे […]

सामाजिक

आधुनिकता

छुट्टी का दिन था. सभी अपने घर में ही थे. बिल्डिंग के बच्चे हमारे फ्लोर पर ही खेल रहे थे. निशा का घर ऐसा था, जहां बिल्डिंग के सभी बच्चे अपनी मनमानी और खेल-कूद किया करते थे. निशा और राहुल को बच्चों से बहुत लगाव था, ऐसा नहीं कि उनका अपना खुद का कोई बच्चा […]

कविता

तन्हाई

हर किसी के जिंदगी में तन्हाई होती है और उस तन्हाई में एक कहानी होती है सूखे पत्ते की तरह उड़ जाती है खुशियां गम की परछाई मन को घेर लेती है फासला कम होता नहीं तन्हाई से वास्ता बढ़ता ही जाता अकेलेपन से कभी हंसता तो कभी रोता है मन खुद ही खुद से […]

कविता

झोंका

तिनका-तिनका जोड़ के घोसला बनता है बड़ी लगन परिश्रम से परिवार सजता है एक तेज हवा का झोंका सब पलभर में उड़ा ले जाता है वक़्त के आगे सब खिलौना ही तो है एक पल का भी कहां खबर किसी को खुशियां बेहिसाब या कि काल का दस्तक दबे पांव वक़्त भी न बड़ी बेरहम […]

कविता

दर्द

दर्द कभी रूठता नहीं है औरत से मुस्कुराता है उसके जीवन में एहसासों की धुरी पर घूमता, विचरता सदैव घूर्णन गति से चक्कर लगाता ही रहता है आदतन हो जाती है औरत जैसे गठबंधन हो गया हो दर्द से….. पर वो रूठती नही और न ही घबराती है एहसासों की इसी धुरी पर एकदिन हंसना, […]