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  • बूढ़ी आँखें…..

    बूढ़ी आँखें…..

    टिकी रहती है दरवाजे पर वो दो जोड़ी आँखें…. टकटकी लगाए देखती है हर आने जाने वाले को करती है इंतजार मेरे आने का वो दो जोड़ी आँखें….. बड़ी प्यारी है ममता भरी है स्नेह से...

  • आधुनिकता..

    आधुनिकता..

    बदलते समय में आने लगी है रिश्तों में नयापन… भुलाने लगे हैं लोग संस्कारों की अहमियत मिटने लगी है लाज, शर्म हया की लकीरें बाप बेटे आज साथ मिलकर पीते हैं बीयर बिगड़ने लगे हैं शब्दों...

  • अंतर्द्वंद

    अंतर्द्वंद

    अक्सर मौन हो जाती हुँ विचारों के उलझे प्रश्नों से जैसे मन को डसता हुआ सवाल और घायल होता जवाब कुछ हलचल मचाते शब्दों के झुंड इतना करते हैं परेशान जैसे खुली खिड़की से नजर आता...

  • प्रकृति….

    प्रकृति….

    वक्त की नजाकत को हम भी समझने लगे हैं प्रकृति को धरोहर समझने लगे हैं पेड़ लगाने लगे हैं वनोत्सव बनाने लगे हैं तालाब जलाशयों का पुनरुद्धार कराने लगे हैं आयुर्वेदिक उत्पादों का उपयोग होने लगा...

  • मौन…..

    मौन…..

    क्यूं है…? लेखनी मौन क्यूं है? कल्पनाएं गौण क्यूं हैं? बढ़ रही हैं मुश्किलें फिजां खामोश क्यूं है आ रही हैं खबरें सरहदों से बढ़ रहे हैं हौसले दुश्मनों के बिछ रही हैं लाशें सैनिकों के...

  • संतुष्टि…..

    संतुष्टि…..

    संतुष्टि सुनो! व्याप्त है अगर.. तुम्हारे हृदय में मेरे प्रेम का सुर्ख गुलाबी रंग तो तुम जरूर महसूस करोगे मेरे मन के अनकहे जज्बात कहते हैं.. प्रेम! मौन को दर्शाता है और खामोशी से दिल की...

  • माँ

    माँ

    माँ ममता की विशाल वट वृक्ष है माँ का हृदय असीम है माँ के आगोश में विश्वास है माँ के छाया में सपने हैं माँ की छाती में अमृत है माँ के लाड़ में जीवन है...

  • दीवार….

    दीवार….

    काश ! तुम्हारा जाना मेरे हृदय पर इतना आघाती न होता चले तो गए तुम बाद उसके जीना मेरा दुश्वार हुआ जिस दर्द और चुभन को मैंने महसूस किया आँसू बनकर नयनों से ढ़लकने लगा कोशिश...

  • जिंदगी….

    जिंदगी….

    जिंदगी देती रहती है वक्त-बेवक्त हर किसी को उसके हिस्से की खुशियाँ औ’ गम कभी दर्द भरी सिसकियाँ तो कभी खुशियों का खिलता कमल पर हर कोई पुरजोर कोशिश करता बुरे वक्त के चंगुल से निकल...

  • कवि….

    कवि….

    कवि जीता है अपनी कविताओं में तमाम दुख औ’ दर्द, खुशियाँ औ’ गम उकेरता है शब्दों के ढांचे में और गढ़ता है जज्बातों का मर्म एहसासों की गहरी स्याही से लिखता है मन का अधूरापन कभी...