गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल 

लगे सूरत शिकारी तो कर सीरत से यारी बचे कैसे जहां से जवां बिरहा की मारी फ़क़त मुफ़लिस को लूटें ये मंदिर के पुजारी जो तेरा ग़म न समझे उसी पर अश्कबारी हमारे काम आई हमारी ख़ाक़सारी — बलजीत सिंह बेनाम

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल 

अपने चेहरे को आईना करके ज़िंदगानी से जी वफ़ा करके उम्र भर आँसुओं में डूबा हूँ एक इंसान को ख़ुदा करके आप आए नहीं जला दीपक सर्द रातों से इल्तज़ा करके कर सभी का भला ज़माने में तू बुरा पाएगा बुरा करके मुश्किलें और भी बढ़ाई हैं ज़हर के पौधे को बड़ा करके — बलजीत […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

तेरे होंठों पर कहानी और कुछ कह रहा आँखों का पानी और कुछ हम दिखाते हैं ज़माने को अलग जी रहे हैं ज़िंदगानी और कुछ ज़हन में तो यादें माज़ी की मगर रस्म दुनिया की निभानी और कुछ जंग ज़ारी इन उसूलों की मियाँ जब तलक़ ख़ूँ में रवानी और कुछ हिज्र के कुछ ज़ख्म […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल 

होता है नूरानी मंज़र मेरे घर जब तुम आते हो दर्पण कुछ बोले तो कैसे दर्पण से क्या कह जाते हो मीठी बातों का विष तीखा इनको अमृत बतलाते हो फूलों से खिल जाते हो तुम फूलों से ही मुरझाते हो माँ के आँचल से बढ़कर क्या माँ का आँचल ठुकराते हो — बलजीत सिंह […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

अगर पास हक़ की क़माई नहीं है अभी प्यास तुमने बुझाई नहीं है ये सोचा ख़ुदा से उसे छीन लाऊँ मगर ऐसी तक़दीर पाई नहीं है जहाँ पर फ़क़त राज़ शैतां का होगा जहाँ में सुकूँ मेरे भाई नहीं है घटा ग़म की बरसी मेरे दिल में ही बस घटा ग़म की अम्बर पे छाई […]