बाल कविता

लाल-लाल तरबूज🍉

लाल – लाल तरबूजा आया । मैंने जी भर कर वह खाया।। गर्मी का मधु फल तरबूजा। मीठा ऐसा ज्यों तर कूजा।। माता और पिता को भाया। लाल – लाल तरबूजा आया।। तपन धूप गर्मी की हरता। तृप्ति प्यास की भी है करता। जिसने देखा मन ललचाया। लाल – लाल तरबूजा आया।। लू – लपटों […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

भूलों का पछतावा कर ले। बात सीख की मन में धर ले।। बोता कीकर बीज रोज़ तू, खारों से निज दामन भर ले। करनी का फ़ल मिले ज़रूरी, वैतरणी के पार उतर ले। अहंकार सिर पर सवार है, इसकी भी तो खोज खबर ले। अपना दोष और पर टाले, ये घर छोड़ दूसरा घर ले। […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

आदमी की छाँव से बचने लगा है आदमी। आदमी को देखकर छिपने लगा है आदमी।। आँख से दिखता नहीं महसूस भी होता नहीं, क्या बला यों आग से तपने लगा है आदमी मूँ दिखा पाने केलायक रह न पाया शख्स ये चश्म दो अपने झुका झिपने लगा है आदमी। हाथ धो पीछे पड़ा आतंक का […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य : लोटा – पुराण

हम सभी यह अच्छी तरह से जानते हैं कि लोटा तो लोटा ही है।यदि लोटे को परिभाषित किया जाए तो ‘लोटा वही है जिसे हर दिशा में लोटने की सुविधा प्राप्त हो।’ लोटा अपने रंग, रूप, आकार और प्रकार में अन्य भाण्डों से कुछ इतर और भिन्न ही होता है।परंतु एक समानता सभी लोटों में […]

बाल कविता

बालगीत – चीनी से अच्छा गुड़ खाना

चीनी से अच्छा गुड़ खाना। रोगों का घर चीनी माना।। प्रकृति ने दी हमें मिठाई। गाढ़ी भूरी हमने खाई।। उदर – रोग सब दूर भगाना। चीनी से अच्छा गुड़ खाना।। हड्डी को मजबूत बनाता। रक्त – चाप का दोष हटाता।। कमी रक्त की पूर्ण मिटाना। चीनी से अच्छा गुड़ खाना।। भोजन को भरपूर पचाता। स्वर […]

बाल कविता

टीका सबको लगवाना है

टीका सबको लगवाना है। कोरोना से मनुज बचाना है।। साठ साल से ऊपर वाले। खोलें अपने भ्रम के ताले।। बीमारी दूर भगाना है। टीका सबको लगवाना है।। भारत ने खोजा है टीका। जो है सबके हित में नीका।। अफ़वाहों से क्या पाना है! टीका सबको लगवाना है।। वैज्ञानिक भारत के ज्ञानी। इनका नहीं विश्व में […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – भक्त -पुराण

अभी तक हमने मात्र भगवान, देवी और देवताओं के भक्त ही सुने थे।लेकिन आज भक्त भी विभक्त हो गए हैं।अब तो चोर ,डकैत,गिरहकट, नेता ,दल आदि सभी के भक्त होने लगे हैं, जो अपने उन तथाकथित इष्टों में पूर्ण समर्पण रखते हैं।भक्त का मतलब ही है कि जिसकी भक्ति करो , उसके प्रति अंधा विश्वास […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

गाँव में वैसी सुहानी, अब कहीं होली नहीं। बोल से मन को रिझाले,नेह की बोली नहीं। सूखी पड़ीं पिचकारियाँ रँग रसायन से बना, ढोल- ढप से गूँजतीं, वे नाचती टोली नहीं। खेलते थे पंक से तब,जन बुरा क्यों मानता, अब गुलालों से भरी वह फागुनी टोली नहीं। खोया मैदा से बना,गुझिया नहीं वैसी मिले, रंग […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

आए थे जग में दुकेले न आए। गए जो धरा से अकेले सिधाए।। माँ थी अकेली थे तुम भी अकेले, तुम्हें जिंदगी के झमेले सुहाए। जब तुम गए तो जमाना खड़ा था, जिसने जो बोला अलबेले कहाए। रोता है कोई बिलखता है कोई, आँसू हिचकियाँ भी ले ले बहाए। जी ले ऐ इंसाँ! जीवन को […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – घर का भेदी लंका ढावे

‘घर में लगती है आग घर के ही चिराग से।’यह कहावत कुछ यों ही नहीं बन गई।इसी प्रकार ‘घर का भेदी लंका ढावे’ भी बहुत प्राचीन त्रेतायुगीन सोने की लंका में घटी घटना पर आधारित है। आज के युग में ये दोनों कहावतें सटीक सिद्ध होती हुई ये कह रही हैं कि वे आज के […]