गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

अफ़वाहों का बाज़ार गरम है। हुआ आदमी बिना शरम है। उनको लाले पड़े जान के , फैलाते कुछ यहाँ भरम हैं। करते राजनीति लाशों पर, निंदा करने योग्य करम है। धर्मध्वजा लेकर जो फिरते, लूट मचाना बना धरम है। क़ुदरत का जब डंडा पड़ता , तब होता आदमी नरम है। नियम और क़ानून न माने, […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

कोरोना का कहर बड़ा भारी है। जगत में व्याप्त महामारी है।। बचाव ही इलाज़ वायरस का , दूसरों को सीख मगर जारी है। पीछे पड़ गया है हाथ धोकर, हाथ धोने का तार तारी है। डरा हुआ हर शख्स मरने से, कौन जानेगा किसकी बारी है। संग अवधान के चलना, जीना, इस इंसान ने न […]

बाल कविता

बाल कविता – गोल ही गोल

सूरज गोल चंदा गोल। धरती , अंबर , तारे गोल।। गाड़ी के पहिए हैं गोल। गेंद हमारी सबसे गोल।। मुरगी का अंडा भी गोल। माताजी का बेलन गोल।। ढोल, नगाड़े, ढप हैं गोल। तबला और मंजीरा गोल।। पंखे के चक्कर भी गोल। घूम रहीं दो सुइयाँ गोल।। आँखों की दो पुतली गोल। आलू और टमाटर […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

अपना कचरा उसके द्वार। कहलाता परिवेश सुधार।। मेरा आँगन मात्र स्वच्छ हो, सबसे बड़ा देश – उद्धार। आता है ऋतुओं का राजा, करते विटप वेश – पतझार। समझदार कितने नर- नारी, नाले में दें क्लेश – उतार। दूर प्रकृति से जाता मानव, बैनर में संदेश – प्रसार। पॉलीथिन कर रहे इकट्ठी, नाली दिए केश सब […]

गीत/नवगीत

अब कोरोना का रोना है

अब कोरोना का रोना है, बद नफरत का भी दंगा है। आदमी आदमी की खातिर, हो गया आज बदरंगा है।। आदमी बन गया शंहशाह, कुत्सित है उसकी कुटिल चाह। आगे बढ़ने की बंद राह, चाहता सभी से वाह वाह।। खाली इंसां का हृदय – कोष, वह बना हुआ भिखमंगा है। अब कोरोना का रोना है […]

बाल कविता

बादल

मैं घन,बादल कहलाता हूँ। सबको ही मैं नहलाता हूँ।। खारे सागर से जल भरता। नभ में ले जा मीठा करता।। धरती पर फिर बरसाता हूँ। मैं घन,बादल कहलाता हूँ।। गरमी में धरती तपती है। प्यासी!प्यासी!नित जपती है। बुँदियाँ बरसा सहलाता हूँ। मैं घन, बादल कहलाता हूँ।। बंजर ,जंगल या फसलों पर। खेतों , नगरों सब […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

अपनी ग़लती का यहाँ आभास है किसको! फूल खिलता ही नहीं सुवास है किसको !! डालना अंगुलियाँ किसी के छिद्रों में, अपने छिद्रों का दर्द रास है किसको! अपनी नज़रों के तले अंधे हम हैं, दिख नहीं पाता है उजास भी किसको! नज़ारे करती है नज़र दुनिया के, अँधेरा दिखता है कभी पास भी किसको! […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – हर्रा लगे न फ़िटकरी!

नकली सोना असली सोने से कुछ ज़्यादा ही चमक का स्वामी होता है।लेकिन जब नकली से असली पीछे छूटने लगे तो असली का क्या काम रह जाता है ? जो उपलब्धि असली से भी नहीं पाई जा सकी और नकली ने वह हासिल करा दी , तो कौन भला हज़ारों गुना कीमती असली को अपने […]

कुण्डली/छंद

बसंत

पीली सरसों खेत में, नाच रही चहुँ ओर। मानो पीली शाटिका, लहराती पुरजोर।। लहराती पुरजोर, चढ़ी है नयन – खुमारी। कामदेव की टेर , कर रही रती कुमारी।। ‘शुभम’ झुका आकाश, ओढ़कर चादर नीली। इठलाती है भूमि, धारकर साड़ी पीली।।1।। पीले पल्लव झर रहे, बिखरी – बिखरी छाँव। उधर लाल कोंपल उगीं, निखरे – सुथरे […]

गीतिका/ग़ज़ल

गजल

हमने जाती बहार को देखा। फूल, कलियों को खार को देखा।। पड़ गए पीत नीम के पल्लव, ऐसे पत्तों की धार को देखा। खिल गए जब गुलाब गालों के , आँख में फिर ख़ुमार को देखा। जिसने पुतले बनाये माटी के, किसने ऐसे कुम्हार को देखा।। रब की कारीगरी अजब देखी, ढार को देखा उभार […]