गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

दूषित न कर इस गंगा नदी को। बहाती जो अमृत नमन जिंदगी को। सूखे पहाड़ों से जो बह रही हैं, भुला मत प्रकृति की परम वंदगी को। ये झरने ये नदियाँ ये झीलें हजारों, हैं जीवंत कविता औ’शायरी को। अभागा न बन मत बर्वाद कर तू, नमन कर हजारों इस सरज़मी को। गाई हैं रब […]

बाल कविता

वीर बहूटी – बालगीत

वीरबहूटी कहलाती हूँ। छूते ही शरमा जाती हूँ।। लाल रंग मखमल-सी काया। जिसने देखा रूप सुहाया।। रेंग – रेंग कर मैं जाती हूँ। वीरबहूटी कहलाती हूँ।। जब अषाढ़ में बादल घिरते। धरती पर जल वर्षा करते।। भूतल के ऊपर आती हूँ। वीरबहूटी कहलाती हूँ।। बच्चे मुझे प्यार करते हैं। छू -छू कर मुझसे डरते हैं।। […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

मुझमें कोई तो कमी रही होगी। आँख में कुछ नमी रही होगी।। पत्थरों में भी बीज बो डाले, उस जगह कुछ जमीं रही होगी। उनको देखा तो चश्म भर आए, उनके घर में गमी रही होगी। हाथ छूते ही गिर पड़े थे वे, वह कोई इक डमी रही होगी। बहुत जोरों का इक तूफान उठा, […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – मौसम शुरू हो गया है

सबका अपना एक मौसम होता है। बिना मौसम के कुछ भी अच्छा नहीं लगता।आज पर्यावरण दिवस से पर्यावरण मित्रों का भी मौसम शुरू हो गया है। बाकायदा हवन में खुशबूदार समिधा की गिनी हुई आहुतियाँ देने के बाद श्रीगणेश हो गया। वैसे साल भर गाहे -ब -गाहे कार्यक्रम चलते रहते हैं। लेकिन जैसे ही पाँच […]

बाल कविता

बालगीत – गर्मी आई ! गर्मी आई !!

गर्मी आई ! गर्मी आई!! स्वाद भरी सौगातें लाई। बाड़ी में महके- ख़रबूज़े। लाल शहद – से हैं तरबूजे।। खीरा ककड़ी खूब सुहाई। गर्मी आई ! गर्मी आई!! ठंडी आइसक्रीम है भाती। मुन्ना खाता मुन्नी खाती।। ठेले की ध्वनि पड़ी सुनाई। गर्मी आई ! गर्मी आई।। खुशबूदार संतरे आए। अंगूरों के ढेर लगाए।। लीची मधुर […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

माँ का शीतल पावन आँचल। तपते दिन का सावन आँचल। दुख में हर पल धैर्य बँधाता , माँ का कोमल वामन आँचल। नौ का वह है सुगम पहाड़ा , प्यारा समतल उपवन आँचल। तप में प्रकाश का सूर्य दिव्य, जीवन-पट का फागुन आँचल। संतति का सुदृढ़ सहारा नित, रक्षक निर्मल भावन आँचल। जन की मर्यादा […]

बाल कविता

बालगीत : जंगल की कहानी

जंगल की तुम सुनो कहानी। सुना रही थी मेरी नानी।। हथिनी हाथी पर चिंघाड़ी। फ़टी हुई है मेरी साड़ी।। नई पड़ेगी तुमको लानी। जंगल की तुम सुनो कहानी।। हाथी बोला बंद दुकानें। कैसे जाऊँ साड़ी लाने।। तुमने ऐसी जिद है ठानी। जंगल की तुम सुनो कहानी।। अपने घर में बंद सभी हैं। बाहर आते कभी […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य : आदमी की देह

बाहर से देखने पर तो वह आदमी ही दिखाई पड़ता है। लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत ही नज़र आती है। उसकी देह तो प्रकृति ने आदमी की ही बनाई है , पर उसकी देह में ही संदेह है। निस्संदेह संदेह है। कुछ जीवों की प्रजातियाँ पशु -पक्षी की देह में भी मानव हैं। उसी प्रकार यहाँ […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

बुरे समय में अच्छी बातें। लगतीं मन को सच्ची बातें।। वे जन हमको शिक्षा देते पकी न जिनकी कच्ची बातें। हर इंसान बना उपदेशक, करता है बड़मुच्छी बातें। कुछ लोगों को कहना भर है, भले कहें वे टुच्ची बातें। अफ़वाहें सिर पैर बिना ही, दौड़ रहीं कनबुच्ची बातें। भुच्चों से उम्मीद यही थी , लाएँगे […]

बाल कविता

बालगीत : पैर

कितने अद्भुत अपने पैर! नहीं किसी से करते बैर।। सबको मंज़िल तक पहुँचाते। ये दुनिया भर को करवाते ।। मेला , हाट , बाग की सैर। कितने अद्भुत अपने पैर!! कर्म – इन्द्रियाँ इनको कहते। भार देह का दोनों सहते।। नहीं शत्रु की करते खैर। कितने अद्भुत अपने पैर!! तू चल !तू चल !!कभी न […]