गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका

देश खूँटों में सिमटकर रह गया। आदमी उनसे लिपटकर बह गया।। अस्मिता , गौरव सभी जाने लगे, गालियों को मंत्र कहकर सह गया। खूँटियों पर टाँग दी हैं नीतियाँ, चापलूसी से चिपककर लह गया। छोड़कर सत का कठिनतम राजपथ, असत में सपना सुलगकर रह गया। पेड़ को साया सघन ही चाहिए, वेदना की आग पलकर […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – बड़ी रसीली, छैल- छबीली

आज भला मुझे कौन नहीं जानता ,पहचानता।जो जानता वह तो मानता ही मानता और जो नहीं जानता वह तो और भी अधिक मानता। मैं हूँ ही ऐसी गूढ़ पहेली , अपने चहेतों की अंतरंग सहेली।चाहते हुए भी मैं रह नहीं पाती अकेली। मैं तो बड़ी ही रसीली हूँ,छैल – छबीली हूँ।रंग-रँगीली हूँ।एक क्षण के लिए […]

कुण्डली/छंद

पंचरंगी कुंडलिया

-1- करके चोरी ‘विज्ञ’जन , बाँट रहे नित ज्ञान। स्वयं नहीं करते कभी,ऐसे विज्ञ महान।। ऐसे विज्ञ महान, ज्ञान की बहती गंगा। बनी हुई नद – नाल, बाँटने वाला नंगा।। ‘शुभम् सुनामी तेज,पहाड़ों से जल गिरके। करते स्वर आक्रांत ,ज्ञान की चोरी करके।। -2- पढ़ते थे पहले कभी,गुटखा ध्यान लगाय। अब गुटखा खाने लगे, दाँतों […]

बाल कविता

बाल कविता – प्यासी गौरैया

सूख रहे सब ताल -तलैया । प्यासी भटक रही गौरैया।। आसमान से बरसें शोले। मरते प्यासे पंछी भोले।। गरम तवे – सी तपती धरती। निकली चिड़िया डर -डरती।। दाना – दुरका चुगने निकली। चिड़िया ने जब देखी तितली। नहीं दिखाई देता पानी। कौन मिलेगा जल का दानी।। मिली एक तब टूटी छानी। बैठ छाँव में […]

मुक्तक/दोहा

दोहा – वृक्षों की छाँव में

वृक्ष धरा के ओज हैं,वृक्ष अवनि – शृंगार। करते हैं इस सृष्टि का,सदा सृजन साकार।। पाँच अंग हैं वृक्ष के, करें मौन उपकार। देते हैं वे फल सदा, यद्यपि सहें प्रहार।। पाकड़ पादप के घने, पत्ते छायादार। पथिकों को दें शांति का, पावन शुचि उपहार मन मानव का थिर नहीं,ज्यों पीपल का पात पत्ते-पत्ते पर […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – ‘मारदेव’ की मार

संसार में ‘मार’ की विकट मार भी अनंत है।इससे नहीं बचा कोई संत या असंत है।जैसा उसका नाम है। वैसा ही उसका काम है।इस भूमंडल पर इसीलिए उसका नाम है। उसी से सृजन है, संसार है। पर ‘मार’ की मार खाने के बाद मनुष्य कहता; ‘ये दुनिया असार है।’ बेचारा इंसान कितना लाचार है।फिर भी […]

बाल कविता

बालकविता – गागर की गरिमा

गर्मी में गागर की गरिमा। कौन न जाने उसकी महिमा। शीतल जल सबको है देती। प्यास देह की वह हर लेती।। माटी का निर्माण निराला। बनते इससे कुल्हड़ प्याला।। हँड़िया दिया सभी अति प्यारे। नादें ,मटकीं हैं सब न्यारे।। गागर का जल अति गुणकारी। शीतलता सुगंध भी न्यारी।। कुम्भकार के श्रम का सोना। रूप निराला […]

गीतिका/ग़ज़ल

दोहा गीतिका – वासंतिक नवरात्र

वासंतिक नवरात्र का, ‘शुभम’ सुहृद उपहार। दुर्गा माँ को पूजता, हर हिंदू परिवार।। जगदंबा नव रूप में, करतीं जन – कल्याण, करे हृदय से साधना,नौ दिन यह संसार। माँ देतीं वैराग्य, तप, बुद्धि , ज्ञान – भंडार, संयम की नव चेतना, निज पावन आचार। माँ दुष्टों का नाश कर,करतीं अभय प्रदान, रहें न अघ के […]

बाल कविता

बाल कविता – हेंचू जी उवाच

हेंचू जी हय से सतराये। आँख दिखाते वे गुर्राए।। ‘घोड़ा जी तुम गर्दभवंशी। एक सदृश हम सब के अंशी। हमसे अलग -थलग रहते हो। उच्च अंश का क्यों कहते हो? हम दोनों हैं भाई – भाई। क्यों ऊँची निज जाति बताई? छोटा कद हमने यह माना। भैया बड़ा तुम्हें है जाना।। फिर भी तुम इतने […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – घुटना-छू ,संस्कृति छू

अतीत की बात हो गई ,जब लोग अपने से ज्ञान, गुण और आयु में बड़े, गुरुजन, माता -पिता , इष्ट देवता आदि के चरण स्पर्श किया करते थे।अब तो पैर छुआने की महत्वाकांक्षा रखने वाले लोगों -लुगाइयों की लिस्ट बहुत लंबी हो गई है। जैसे :नेता, अधिकारी, मंत्री आदि। बहू के द्वारा सास ,श्वसुर ,पति […]