गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

हर वक़्त बोझ से मन भारी। लगता मन भर का कन भारी। मन ही चालक है जीवन का, सँभले न रोग तो तन भारी। जब दाल झूठ की गले नहीं, लगता सच का तृन-तृन भारी। कायर तो पीठ दिखाते हैं, लगता उनको हर रन भारी। जब साँपों में विष नहीं भरा, उनको है अपना फन […]

हास्य व्यंग्य

मैं दहेज़ हूँ!

आप सभी लोग मुझे बहुत अच्छी तरह से जानते- पहचानते हैं। प्रायः लोग मुझे ‘दहेज’ के नाम से जानते हैं।दहेज़ एक ऐसी संपति है, जिसे विवाह के समय ,पहले अथवा बाद में लड़की वाले द्वारा लड़के वाले को दिया जाता है। इस बात को इस प्रकार भी कहा जा सकता है,कि लड़के वाले द्वारा लड़की […]

बाल कविता

बाल कविता – तुलसी

लाल – हरे तुलसी के पत्ते। लगते तीखे जब हम चखते।। कहती दादी अति गुणकारी। तुलसी-दल की महिमा न्यारी। वात और कफ़ दोष हटाती। हृदय रोग भी शीघ्र मिटाती।। उदर -वेदना, ज्वर को हरती। भूख बढ़ाती, बुद्धि सँवरती।। रोग रतौंधी होता दूर। डालें पत्र – स्वरस भरपूर।। कर्ण-वेदना , पीनस जाती। सूजन को भी हरती […]

बाल कविता

बालगीत – आ गई रजाई

शीत बढ़ी आ गई रजाई। मौसम ने ली है अँगड़ाई।। दादी अम्मा शी-शी करतीं। ओढ़ रजाई सर्दी हरतीं।। दिन में धूप करे गरमाई। शीत बढ़ी आ गई रजाई।। साग चने का मोटी रोटी। चूर्ण बाजरे की वह छोटी।। खाते हम सब चुपड़ मलाई। शीत बढ़ी आ गई रजाई।। ले-ले स्वाद गज़क हम खाते। शकरकंद मीठे […]

बाल कविता

बालगीत – चूल्हे वाली रोटी

चूल्हे वाली रोटी खाएँ। अपना तन-मन स्वस्थ बनाएँ। बनी गैस की रोटी खाता। रोग धाम तन-मन बन जाता। उदर -रोग दिन – रात सताएँ। चूल्हे वाली रोटी खाएँ।। ईंधन सूखा काष्ठ जला कर। उपलों का उपभोग करा कर। रोटी, सब्जी ,दाल पकाएँ। चूल्हे वाली रोटी खाएँ।। दूषित गैस नहीं बनती है। यदि लकड़ी घर में […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

जुबाँ-जुबाँ की साला गाली। दीवारें ज्यों आला वाली।। खोखल करता साला घर को, मिश्री-सी मधुबाला साली। सोचे बिना जुबाँ पर बसता, जुबाँ न होती ताला वाली। पत्नी का कहलाता भाई, जीभ नुकीली भाला वाली। क़ानूनन वह भाई जैसा, बहता प्रेम – पनाला खाली। जीजाजी के घुटने छूता, जीजी ने गलमाला डाली। ‘शुभम’ सार से हीन […]

बाल कविता

बालगीत – साबुन

घिस – घिस छोटा मैं होता हूँ। मैल तुम्हारा मैं धोता हूँ।। तरह – तरह के रँग हैं मेरे। महक ताजगी भरी बिखेरे।। कभी न मैला मैं होता हूँ। मैल तुम्हारा धोता हूँ।। सब ही मुझको साबुन कहते। सस्ते – मँहगे भी हम रहते।। कभी नहीं मैं तो सोता हूँ। मैल तुम्हारा मैं धोता हूँ।। […]

कुण्डली/छंद

कुण्डलिया : यौवन के दिन चार

-1- बचपन के दो नयन में,ले भविष्य आकार। वर्तमान देखें युवा, जरा अतीताभार।। जरा अतीताभार, देखता बीते कल को। चखता बारंबार, मधुर-खट्टे रस फल को।। ‘शुभम’ सुहाना काल,लगे जब आता पचपन। जिज्ञासा में लीन,देखता कल को बचपन।। -2- बूढ़े की पहचान है , देखे काल अतीत। फूल सभी जब फल बनें, बाकी रहे न तीत।। […]

बाल कविता

बालगीत – माँ की लोरी

मुझे याद है माँ की लोरी। माँ थी मेरी कितनी भोरी।। बिस्तर जब गीला हो जाता। रोकर अपना कष्ट बताता।। लेती समझ वेदना मोरी। मुझे याद है माँ की लोरी।। नींद नहीं जब मुझको आती। थपकी दे – दे मुझे सुलाती।। गा- गा मीठे स्वर में लोरी। मुझे याद है माँ की लोरी।। कभी जाँघ […]

हास्य व्यंग्य

इज्जतघर की बात

अपनी -अपनी सबको प्यारी है। अब चाहे वह घरवाली हो अथवा इज्जत। हमारे यहाँ घरवाली को इज्जत का पर्याय भी माना जाता है।घरवाली से ही घर की इज्जत है। इसीलिए तो कहा गया है कि ‘बिन घरनी घर भूत का डेरा।’जब वही नहीं तो आपको कौन पूछने वाला है भला ! इसीलिए तो यह भी […]