बाल कविता

मदारी

देखो   एक    मदारी   आया। बंदर और  बंदरिया    लाया।।   डम-डम डमरू बजा रहा है। बंदरी  को वह सजा रहा है।। लाल घँघरिया  पहना लाया। देखो  एक   मदारी  आया।।   बंदर    पहने   नेकर  नीली। है कमीज उसकी जी पीली।। सिर पर साफा हरा सुहाया। देखो एक   मदारी   […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

राजनीति  गरमाने   के   दिन। सच को भी शरमाने के दिन।। जाल   बिछाया   दाने   डाले, चिड़ियों को भरमाने के दिन। आसमान   पर   है    मँहगाई, जनता  को गरमाने  के  दिन। कर की  मार  सहन करनी है, वादा किया घुमाने  के दिन। गाल बज   रहे  धूम – धड़ाका, अपनी […]

मुक्तक/दोहा

मुक्तक – हे मृगनैनी !

हे     मृगनैनी  !   बाले     तेरे; नयन – तीर  हैं  पैने    कितने! सरि के  भीतर  लक्ष्य साधतीं; हम   हैं   हैरां   भारी   इतने!! अपनी तरनि बिठाकर हमको; पार लगा दो  ‘शुभम’  नदी  से, मत्स्य – बेध मत करो तीर से, हमें बेध   डाला   है तुमने!१।   दृष्टि   हुई […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – तब और अब

आप अपनी जानें ,हम तो अपनी बात कहते हैं।कहें भी क्यों नहीं ,आज के जमाने के जुल्म जो सहते हैं।अब आप ये समझ लें कि मुर्दे ही प्रवाह में बहते हैं। हम तो हैं ही वे बंदे ,जो नदी की धार को चीर कर प्रवाह के विपरीत बढ़ते हैं। नए जमाने की हवा अभी इतनी […]

बाल साहित्य

डेंगू से है जंग हमारी (बालगीत)

डेंगू से है जंग हमारी। करें हराने की तैयारी।। स्वच्छ रखें अपना घर पूरा। रहे पास में एक न घूरा।। करें सुबह से सब तैयारी। डेंगू से है जंग हमारी।। फ़िर भी यदि बुख़ार आ जाएँ तुलसी दल की चाय बनाएँ।। पिएँ पपीता – रस भी भारी। डेंगू से है जंग हमारी।। मत भूलें मैंथी […]

हास्य व्यंग्य

तब और अब !

तब और अब (व्यंग्य) आप अपनी जानें ,हम तो अपनी बात कहते हैं।कहें भी क्यों नहीं ,आज के जमाने के जुल्म जो सहते हैं।अब आप ये समझ लें कि मुर्दे ही प्रवाह में बहते हैं। हम तो हैं ही वे बंदे ,जो नदी की धार को चीर कर प्रवाह के विपरीत बढ़ते हैं। नए जमाने […]

कुण्डली/छंद

कुंडलिया – जननी प्रभु का रूप है

-1- माँ की ममता- मापनी,बनी नहीं भू मंच। संतति का शुभ चाहती,नहीं स्वार्थ हिय रंच नहीं स्वार्थ हिय रंच,सुलाती शिशु को सुख से गीले में सो आप,भले काटे निशि दुख से।। ‘शुभं’न उपमा एक,नहीं माँ सी जग झाँकी। जनक पिता का त्याग,श्रेष्ठतम ममता माँ की -2- जननी माँ प्रभु रूप हैं,धीर नेह का धाम। सदा […]

गीत/नवगीत

स्वेद बहाकर पेट पालता

स्वेद बहाकर पेट पालता, रिक्शा  भले चलाता   है। एक पैर   से आगे बढ़ता, दंड – सहारा    पाता है।। चोरी करता नहीं किसी की, अपने श्रम का संबल है। दिन भर सड़क नापता लंबी, चलती -फिरती वह कल है।। यद्यपि पद के बिना जी रहा, तनिक नहीं घबराता है। स्वेद बहाकर पेट पालता, रिक्शा भले […]

बाल कविता

बालगीत-तारे औऱ बाल जिज्ञासा

दिखें रात में नभ में तारे। जाते कहाँ दिवस में सारे।। टिम-टिम करके करते बातें। अच्छी लगती हैं तब रातें।। लगते हैं आँखों को प्यारे। दिखें रात में नभ में तारे।। माँ! तारों का घर अंबर में। कैसे लटके वे अधवर में।। आँखें ज्यों मिचकाते सारे। दिखें रात में नभ में तारे।। सूरज का क्या […]

बाल कविता

बालगीत- लहँगे का भाई:प्लाजो

पाजामे का   नव  अवतार। प्लाजो आया तज सलवार।। नए रूप में बड़ा निराला। रंग – बिरंगा नीला काला।। नीचे – ऊपर सम आकार। प्लाजो आया तज सलवार।। पहन रहे थे अब तक पापा। मम्मी भी खो बैठीं आपा।। छिड़ी एक दिन मीठी रार। प्लाजो आया तज सलवार।। सट – सट टाँगें घुस जाती हैं। पहन […]