गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

आस्तीनों में  छुपे  साँप  दग़ा देते हैं। खून अपनों का ज़माने में बहा देते हैं।। घर बनाने  में बड़ी   उम्र ख़र्च होती है, लोग उस घर को  बिना बात जला देते हैं। हरेक लम्हा जो फिरते हैं लेके चिनगारी, ऐसे  नादान ही  तो घर को जला  देते हैं। किसी का बनता हुआ घर उन्हें कसकता […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य – नकल का सुख

नकल का भी अपना ही सुख है।हम बचपन से नकल करते -करते बड़े हो गए। छोटे थे तो अपने माता -पिता और बड़ों की नकल की।नकल से बहुत कुछ सीखा ।और इस प्रकार नकल से असल रूप में तैयार हो गए। पर नकल करने का हमारा संस्कार नकली नहीं रहा। वह असली हो गया। नतीजा […]

कविता

प्रकृति और योग

प्रकृति से दूर विकृति भरपूर, प्रकृति का साथ जीवनी -शक्ति का हाथ, प्रकृति की विकृति ही जगत, जगती सृजन सृष्टि, प्रकृति और पुरुष का योग नवीन सर्जना का सुयोग।  प्रकृति क्या है? ब्रह्मांड की ज्या है, मापती हुई अखिल ब्रह्मांड का व्यास, सृष्टि का विन्यास, एकरूपता से अनेकरूपता पुनः अनेकरूपता से एकरूपता, साम्यावस्था या प्रलयावस्था, […]

कविता

सात सुर

स र ग म के सात सुर, साथ -साथ सात सुर, सुर में सुर मिलाते, नया संगीत सजाते, श्रवण से हृदय  में- उतर -उतर जाते, कभी मेघ मल्हार बन- धरा पर मेघ बरसाते, कभी राग दीपक से- अनजले दीपक जलाते। स र ग म के ये सात सुर ‘सुर ‘  हैं  ‘असुर’   नहीं, स्वर हैं […]

बाल कविता

बालगीत : वर्षा आई

अम्मा    देखो     वर्षा   आई। रिमझिम रिमझिम बुँदियाँ लाई। हम  नहाएँगे   बाहर   जाकर, सड़क खेत गलियों में आकर, दौड़  भाग  कर  धूम   मचायें, नाचें    कूदें       गाने      गाएँ, लगती   वर्षाऋतु     मनभाई। अम्मा देखो….. बरस रहा  है  झर -झर पानी, नहीं    पेड़   बेलें    मुरझानी, डालें   झूम   रही   हैं  […]

हास्य व्यंग्य

व्यंग्य : कुत्ते की चोट बिल्ली पर

पी -पीकर अपनी आँतें गला लीं। दिल का दिवाला निकाल दिया।जिगर का ज़िक्र ही क्या करें, वह भी बेचारा बे -चारा हो गया। अस्पताल में भर्ती हुए , कुछ दिन में भगवान के प्यारे हो गए। पीटा गया निरीह डाक्टर। सड़कों में गड्ढे। चालक की लापरवाही ।नतीजा भयंकर दुर्घटना । कुछ मरे कुछ घायल। घायलों […]

सामाजिक

हमारी मानसिकता

मानव जीवन मन से संचालित है। वही इस शरीर रूपी रथ का सारथी है। इस तथ्य को भगवान श्रीकृष्ण ने श्री मद्भगवत गीता में विस्तार से समझाया है। इन्द्रयों रूपी दस घोड़े उसे अपनी -अपनी दिशा में खींच रहे हैं। ऐसी दशा में यदि हमारा मन रूपी सारथी देह रूपी रथ को बचाने के लिए […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

विधना के  खेल निराले हैं, फूलों  में  उगते   भाले  हैं। करनी का सबको फ़ल मिलता, शुभ फ़ल के बड़े कसाले हैं। अन्याय असत का सरल मार्ग, अधिकांश  इसी  पथ वाले हैं। अपने हित न्याय टाँग खूँटी, सतपथ में मकड़ी -जाले हैं। सौ झूठे उधर  एक ही सच, ये  झूठे  बहुमत  वाले   हैं। सच मौन व्यथित […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

सुख के बदले दुःख का आना। जीवन  का  दस्तूर  पुराना।। अपनी   राहें   चलते –  चलते, मंज़िल पर खुद को पहुँचाना। काँटों के सँग लाख रुकावट, लक्ष्य-सिद्धि तक मत घबराना। जितने  मुँह  हैं  उतनी बातें, ख़ुद को इसमें मत उलझाना। सुनना सबकी करना मन की, निज विवेक का ‘शुभम’ जमाना।। — डॉ. भगवत स्वरूप ‘शुभम’

संस्मरण

संस्मरण – मेरा एम. ए. में प्रवेश

वर्ष 1973 में बी .एस सी. उत्तीर्ण करने के बाद मेरी इच्छा थी कि अपने प्रिय विषय वनस्पति -विज्ञान में एम.एस सी. करने के बजाय हिन्दी विषय के साथ एम.ए. करूँ। प्रवेश हेतु सिफारिश के लिए मैंने अपने पूज्य चाचा जी डॉ. सी.एल. राजपूत; जो उस समय आगरा कालेज आगरा में मनोविज्ञान विषय के प्रोफ़ेसर […]