कविता

एहसास

जिंदगी की सांसे रुक जाये | वक़्त की रफ़्तार में ठहराव आ जाये | अरमानों की बोरी फट जाये | धड़कनो की धक् धक् उलझ जाए | आखों के आशू सूख जाये | जुबान ख़ामोश हो जाये | उम्मीदों का बाजार बंद  हो जाये | दिमाग के  ख्यालो में जंग लग जाये | दिल का […]

लघुकथा

एक आत्म लघु कथा – भिखारन

एक दिन मैं और मेरे कुछ मित्र एक मंदिर क दर्शन  करने गए| हम मंदिर में परवेश कर रहे, तो दो भिखरन मंदिर क दरवाजे पर बैठी हुई थी | जब हम वापस मंदिर से दर्शन करके लौट रहे थे |  तभी उन दोनों भिखरन में से एक ने मेरा बेग पकड़ लिया और बोली […]

कविता

कविता – गरीबी

गरीबी की बस इतनी सी कहानी है | हाथ में दबे दो मुट्ठी चून की , मंदी सी  आंच पे रोटी पकानी है | कशमकश में है उनकी जिंदगी भी ये सोचकर के , किस तरह इन्हे आज और भूखे पेट से थोड़ी सी मोहलत दिलानी है | गरीबी की बस इतनी सी कहानी है […]

कविता

कविता-वक्त

मैंने वक़्त को हालातो में बदलते देखा है | अपनों को गैरो में बदलते देखा है | बरसात में बंजर जमीन को गीली मिट्टी  से महक़ते  देखा है | औरो की तो बात क्या करु | मैने बचपन को जवानी का लालच देकर बुढ़ापे में पनपते देखा है | मैंने वक़्त को हालातो में बदलते […]

कविता

जमाना

पहले रिश्तो का नाम हुआ करता था जिंदगी और आजकल रिश्ते ही कहाँ हुआ करते है पहले कच्चे मकानों में भी लोगो के दिल बड़े हुआ करते थे और आजकल कच्चे मकान ही कहाँ हुआ करते है पहले अहमियत लोगो को दी जाया करती थी पैसो को नहीं और आजकल लोगो की अहमियत ही कहाँ […]

कविता

कविता- श्रमिक

  देखती हूँ , अक्सर कुछ गरीबो को बहुत मेहनत करते हुए | फिर भी उनकी मेहनत का किसी पर कोई उपकार नहीं होता | एक श्रमिक ही है जिसे उसकी मेहनत का सच्चा अंजाम नहीं मिलता |   बनाकर बड़ी बड़ी इमारतें लोगो की, खुद झोपड़ियों में सोता है | चलाकर रिक्शा न जाने […]

कविता

कविता – बेटी

आसान नहीं यहाँ बेटी बन पाना. खुद की इच्छाये दबाकर दुसरो को खुश रख पाना. जनम से ही भेदभाव के रंग में रंग जाना. आसान नहीं यहाँ बेटी बन पाना. पिता की लाड़ली बनकर सब पे रोब ज़माना. फिर पिता की इज्जत के लिए खुद की भावनाएं छुपाना. खुद के लिए अपनों से पराया धन […]

कविता

कविता – नारी

लिखती हूं आज फिर नारी के बारे में! इस सोये संसार की आत्मा को जगाना चाहूंगी! आज फिर मैं नारी को उसकी पहचान दिलाना चाहूंगी! रूप तो बहुत नारी के इस धरती पे! उन ही रूपो में से चंद को गिनाना चाहूंगी! आज फिर मैं नारी को उसकी पहचान दिलाना चाहूंगी! बेटियो को बोझ और […]