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  • कविता : औरत

    कविता : औरत

    औरत ! जिंदगी भर भट्टीखाने में धुएं में रोटियां सेंकती हुई बच्चों की परवरिश में गंवा देती है जिंदगी मर्द की डांट सहकर जुल्म बर्दास्त कर खामोशी – सी अख्तियार कर खड़ी रहती है बूत के...

  • कविता : सपना

    कविता : सपना

    आदमी जब अपने सपनों को तिलांजलि देकर किसी औरत के लिए बुनता है एक नया सपना तब वह बन जाता है पति और जब पति पत्नी के ख्वाबों की दुनिया छोड़ देखने लगता है अपनी संतान...

  • कविता : हिलोर

    कविता : हिलोर

    इक हिलोर तेरी यादों की सुने अंतस के सुप्त कणों में रह-रह कर उठती है इक हिलोर अतीत के कब्र में दफन आदमी की परत दर परत को उखेड़ती है इक हिलोर स्वार्थ की दुनिया के...