गीत/नवगीत

ढाक के तीन पात

कोशिशें बहुत करीं पर ,कुंभकरण जागे नही ।अंत में परिणाम आया ,ढाक के बस तीन पात। देकर के आसरा हर बार वो टरकाते रहे ।तब भी हम ऊसर में बीज नित बहाते रहे।भैंसो के आगे हम बीन भी बजाते रहे ।बहरों के आगे हम मेघ राग गाते रहे । फिर हमने जाना बाँझ ,जाने क्या […]

मुक्तक/दोहा

शिक्षक

1:- रोशनी बनकर जीवन की राहें हमको दिखाते हैं।भला क्या है, बुरा क्या है ,हमें हरपल सिखाते हैं।जन्म माँ बाप देते हैं, भूख रोटी दिला देती ,‘दिवाकर’ आदमी को आदमी शिक्षक बनाते हैं।2:- अरस्तू हैं कहीं पर तो ,कहीं गुरु द्रोण है शिक्षक।हमारी जिंदगी की मुश्किलों का तोड़ है शिक्षक।‘दिवाकर’ जिंदगी को जो सफलता की […]

गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका

जोर चली पुरवाई है ।नदिया भी बौराई है । स्वप्न कृषक के सूख गये,बाढ़ खेत में आई है । कर्तव्यों ने प्रौढ़ किया ,बोझ तले तरुणाई है। पर्वत उतरी सरिता सी,यौवन की अँगड़ाई है । कूप सामने, लौटूँ तो -पीछे गहरी खाई हैं। चलो गंजरहा, गाँवों में-शेष बची मनुसाई है । ——-डॉ. दिवाकर दत्त त्रिपाठी

गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका

कुछ पीड़ा के चित्र घनेरे।उर के पट पे आज उकेरे। मेरे दुख की रात न बीती,जग में आये रोज सवेरे । मन की मीन बहुत उलझी है,डाल न चारा , समय मछेरे ! एकाकी पथ नाप रहा हूँ,बागी निर्णय थे सब मेरे । दीप अकेला कब तक लड़ता,दुश्मन थे हर ओर अंधेरे । मुझसे उत्तर […]

कविता

कविता-अपेक्षाएँ

हाय इतनी अपेक्षाएँ, एक नन्ही जिंदगी,किस अपेक्षा पर खरा उतरूँ ? मित्रों की कुछ अपेक्षाएँ,चाहतें कुछ प्रेमिका की,कुछ मेरे दायित्व हैं –माँ बाप के प्रति ।देश का ऋण,धर्म का ऋण,जाति का ऋण,कुछ मेरे दायित्व हैं-संतान के प्रति ।इतनी सारी बेदियाँ हैं, बलि की खातिर,बता! किस पे कौन इच्छा बलि करूँ ? दौड़ धन की ,दौड़ […]

गीत/नवगीत

पीपल की बरगद से चाहकर बात नही होती

पनपे कंकरीट के जंगल, बड़े मंझोले पेड़ काटकर,पीपल की बरगद से चाहकर बात नही होती । सावन की पुरवैय्या सूनी ।दादी की अंगनैय्या सूनी ।सरिता का संगीत शोकमय,बंधी घाट पर नैय्या सूनी । महुए की सुगंध से महकी रात नही होती ।पीपल की बरगद……………………….. कहीं खो गये कोयल ,खंजन।दूर हो गये झूले सावन ।उजड़ रहे […]

गीत/नवगीत

कौन हृदय की पीर सुनेगा?

कौन हृदय की पीर सुनेगा ,इस दुख के निर्जन कानन में ?घड़ी वेदना की निर्मम है, एक झंझावात सा है मन में । मोल करेगा कौन जौहरी,मोती टपक रहे हैं दृग से?शूल और पाषाण चुनेगा ,कौन भला इस दुष्कर मग से?कौन मेरे उर की पीड़ा को ,अपनी पीड़ा समझ सकेगा,क्यों मैं कोई आशा पालूँ,स्वारथरत, कटुतामय […]

कहानी

भूल

पिछले कई सालों से लखनऊ आना जाना हुआ है, मगर कभी गुरूजी से नही मिल सका। मैंने सोंचा, आज मैं गुरूजी से मिलकर जाऊँगा। गुरूजी हमें पीएमटी की तैयारी के दिनों में प्राणि विज्ञान पढ़ाते थे और, बहुत ही सहृदय और नियमों के पक्के, उदारवादी चरित्र। मैं उनका सबसे प्रिय शिष्य था। वह लखनऊ के […]

गीत/नवगीत

गीतों के गाँव में

[ गीत ]शहर के कोलाहल से,चलो प्रिये लौट चलें !गीतों के गाँव में,पीपल की छाँव में । कोयल अमराई हो, महकी पुरवाई हो ।हो बसंत डाल डाल बगिया बौराई हो ।गेहूं के पके खेत ,कनक सरिस दिखते हों,प्राची पट ओढ़ लाल,ऊषा जब आई हो । चार नयन फिर उलझें ,सरित मध्य नाव में।गीतों के गाँव………………. […]

गीतिका/ग़ज़ल

गीतिका

खेतियाँ जब जहर की करे आदमी । तो बताओ कि क्यों न मरे आदमी ? हर तरफ से प्रकृति को चरा आपने , क्यों प्रकृति आपको न चरे, आदमी? अन्न ,पशु,कीट,खग,मत्स्यकुल खा गया, राक्षसों सा उदर; तू भरे आदमी ! आग से खेलना तुझको महँगा पड़ा, अपनी ही आग में अब जरे ,आदमी । कंकरीटों […]