गीतिका/ग़ज़ल

चलो फिर समर में

ग़ज़ल चलो फिर समर में उतरते हैं हम भी ज़माने की सूरत बदलते हैं हम भी अंधेरों ने बेशक हमें घेर रक्खा शुआओं में लेकिन चमकते हैं हम भी हमें है पता वोट की अपने क़ीमत न भूलो हुक़ूमत बदलते हैं हम भी भले वो हमारी हो या दूसरों की मुसीबत में लेकिन तड़पते हैं […]

गीतिका/ग़ज़ल

पर्वत जैसे लगते हैं बेकार के दिन

पर्वत जैसे लगते हैं बेकार के दिन हम भी काट रहे हैं कारागार के दिन रोशनदानों पर मकड़ी के जाले हैं उतर गये हैं भीतर तक अंधियार के दिन मैंने पूछा कब तक देखूं चांद तुझे वो बोला जब तक हैं ये दीदार के दिन चारों तरफ दिखे केवल कोरोना ही कितने दर्दीले हैं ये […]

गीतिका/ग़ज़ल

छूट गया घर तब जाना घर क्या होता है

छूट गया घर तब जाना घर क्या होता है कोरोना ने दिखलाया डर क्या होता है सारे सपने मेरे भी हो जाते पूरे चूक गया तब जाना अवसर क्या होता है बचपन में मैंने भी मूरत पूजा की है ठोकर खाकर जाना पत्थर क्या होता है ठेकेदारों और कहीं जाओ तो अच्छा मुझको है मालूम […]

गीतिका/ग़ज़ल

लाॅकडाउन हो गया

यूँ अचानक हुक्म आया लाॅकडाउन हो गया यार से भी मिल न पाया लाॅकडाउन हो गया बंद पिंजरे में किसी मजबूर पंछी की तरह दिल हमारा फड़फड़ाया लाॅकडाउन हो गया घर के बाहर है कोरोना, घर के भीतर भूख है मौत का कैसा ये साया लाॅकडाउन हो गया गांव से लेकर शहर तक हर सड़क […]

गीतिका/ग़ज़ल

झील में खिलते कमल दल की कतारों की तरह

झील में खिलते कमल दल की कतारों की तरह तुम हसीं लगती हो बर्फीले पहाड़ों की तरह चांदनी आयेगी,खेलेगी कभी लहरों से राह हम देखते दरिया के किनारों की तरह मेरे जैसे यहां कितने ही है दीवाने और रात भर जागते रहते जो सितारों की तरह मेरे महबूब की लहराती घनेरी जुल्फें मेरे शानों पे […]

गीतिका/ग़ज़ल

बवंडर उठ रहा है क्या तुम्हें इसकी ख़बर भी है

बवंडर उठ रहा है क्या तुम्हें इसकी ख़बर भी है तबाही से डरे हैं लोग घबराहट इधर भी है मेरी मंज़िल मुझे आवाज़ देती है चले आओ उधर है डूबता सूरज इधर धुँधली नज़र भी है समझने बूझने में साल कितने ही गँवा डाले समय है कम हमें मालूम है लंबा सफ़र भी है ज़रा […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल ….. उडी़ ख़बर कि शहर रोशनी में डूबा है

उडी़ ख़बर कि शहर रोशनी में डूबा है गया क़रीब तो देखा कि महज़ धोखा है बडे़ घरों की खिड़कियाँ कहाँ खुलें जल्दी जिधर भी देखता हूँ हर तरफ़ अँधेरा है उनके कुत्ते भी दूध पी के सो गये होंगे मगर बच्चा बगल का दो दिनों से भूखा है किसी ग़रीब की इमदाद कौन है […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल ….मेरी आँखों से उसे दरिया बहाना आ गया

मेरी आँखों से उसे दरिया बहाना आ गया अब उसे कमज़ोर नस मेरी दबाना आ गया वो हमारी शक्ल पर भी तंंज कसता खूब है फिर भी मैं खुश हूँ कि उसको मुस्कराना आ गया चार दिन पहलें तलक कहते थे सब बच्चा उसे कब उसे इस दरमियाँ बिजली गिराना आ गया थामकर उँगली जिसे […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल – गमे आशिक़ी ने सँभलना सिखाया

गमे आशिक़ी ने सँभलना सिखाया समंदर में गहरे उतरना सिखाया अकेले थे पहले बहुत खुश थे लेकिन तेरी आरज़ू़ ने तड़पना सिखाया बड़ी धूल थी बारहा रुख़ पे मेरे तेरी इक नज़र ने सँवरना सिखाया कभी मैंने ख़ारों की परवा नहीं की गुलों ने मुझे भी महकना सिखाया लगी आग दिल में तो ख़ामोश रहकर […]

गीतिका/ग़ज़ल

गरीबी से बढ़कर सज़ा ही नहीं है

गरीबी से बढ़कर सज़ा ही नहीं है सुकूँ चार पल को मिला ही नहीं है कहाँ ले के जाऊँ मैं फ़रियाद अपनी ग़रीबों का कोई ख़ुदा ही नहीं है मुझे फ़िक्र उनकी है जिनके घरों में कई दिन से चूल्हा जला ही नहीं है मुहब्बत को भी लोग पैसों से तौलें दिलों में भी अब […]