गीतिका/ग़ज़ल

कैसे हो पार कश्ती

कैसे हो पार कश्ती घबरा के मर न जाऊँ तूफ़ान में घिरा हूँ ग़श खा के मर न जाऊँ। ख़ुद को समझ रहा था सबसे बड़ा खिवैया मौला मुआफ़ कर दे शरमा के मर न जाऊँ। महसूस हो रहा है बारूद पर खड़ा हूँ अपने हसीन सपने दफ़ना के मर न जाऊँ। बरसों से आस्तीं […]

गीतिका/ग़ज़ल

अपना है मगर अपनो सी इज़्ज़त नहीं देता

अपना है मगर अपनो सी इज़्ज़त नहीं देता उड़ता हुआ बादल कभी राहत नहीं देता।   फ़रमाइशें हैं शान में उनके भी हो ग़ज़ल मेरा ज़मीर इसकी इजाज़त नहीं देता।   मेरी भी ख़्वाहिशें हैं कि छू लूँ मैं आसमान टूटा हुआ पर उड़ने की त़ाक़त नही देता।   बेवजह वो रखता है सदा खुद […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़मे आशिक़ी ने सँभलना सिखाया

ग़मे आशिकी ने सँभलना सिखाया समन्दर में  गहरे उतरना सिखाया   अकेले थे  पहले बहुत खुश थे  लेकिन तेरी आरज़ू ने  तड़पना सिखाया   बड़ी धूल थी बारहा रुख़ पे  मेरे तेरी इक नज़र ने सँवरना सिखाया   कभी मैंने ख़ारों की परवा नहीं की गुलों ने मुझे भी  महकना सिखाया   लगी आग दिल […]

गीतिका/ग़ज़ल

आग लगाने वाले भी कम नहीं यहाँ

आग लगाने वाले भी कम नहीं यहाँ शोर मचाने वाले भी कम नहीं यहाँ दरिया में उतरे हो तैर नहीं सकते नाव डुबाने वाले भी कम नहीं यहाँ रिश्तों को तोड़ने में मत विश्वास करो बैर बढ़ाने वाले भी कम नहीं यहाँ किसके कहने पर तुमने घर छोड़ दिया पथ भटकाने वाले भी कम नहीं […]

गीतिका/ग़ज़ल

खुला आकाश भी था सामने माक़ूल मौसम था

खुला आकाश भी था सामने माक़ूल मौसम था मगर अफ़सोस है उड़ने का उसमें हौसला कम था बहुत मुश्किल था करना फ़ैसला हम किस तरफ़ जाते किसी के घर में ख़ुशियाँ तो किसी के घर में मातम था कोई हलचल नहीं थी और सब ख़ामोश बैठे थे कहीं पर धूप ज़्यादा थी , कहीं वातावरण […]

गीतिका/ग़ज़ल

माँ तू कैसे जा सकती है तेरी यादें ज़िंदा हैं

माँ तू कैसे जा सकती है तेरी यादें  ज़िंदा हैं मेरी आँख खोलने वाली तेरी आँखें ज़िंदा हैं उठो लाल अब आँखे खोलो , याद अभी तक वो कविता टिक – टिक करती घड़ी बोलती तेरी साँसें ज़िंदा हैं माँ की ममता क्या होती है साक्षी हैं जो पल -पल की वो सुबहें भी ज़िंदा […]

गीतिका/ग़ज़ल

सबके समक्ष हाथ पसारा नहीं जाता

सबके समक्ष हाथ पसारा नहीं जाता जो दर्द व्यक्तिगत हो वो बाॅटा नहीं जाता आता है सुअवसर कहाँ जीवन में बार-बार अच्छा हो मुहूरत तो वो टाला नहीं जाता ऐसा समय आयेगा ये मालूम कहाँ था अब वक़्त तुम्हारे बिना काटा नहीं जाता मुझ से ख़फ़ा यहाँ की हैं सारी हुक़ूमतें पर, क्या करूँ अन्याय […]

गीतिका/ग़ज़ल

आधी रात को सारा आलम सोता है

आधी रात को सारा आलम सोता है एक परिन्दा डाल पे तन्हा रोता है कितने दर्द पराये , कितने अपने हैं कोई फर्क नहीं वो सबको ढोता है मुश्किल हो जाता तब दिल को समझाना बदली में जब चाँद सुहाना होता है कब समझेगा सच्चाई इन्सान मगर पाने की लालच में क्या-क्या खोता है एक […]

गीतिका/ग़ज़ल

छुपाकर कोई काम करते नहीं हैं

छुपाकर कोई काम करते नहीं हैं मगर सबसे हर बात कहते नहीं हैं बड़ा नाज़ है हमको अपनी अना पर हुकू़मत के आगे भी झुकते नहीं हैं ख़ुदा ने बहुत कुछ हमें भी दिया है किसी की तरक्की से जलते नहीं हैं गुमाँ होगा अपने उन्हें इल्मो फ़न पर सरल बात पर वो समझते नहीं […]

गीतिका/ग़ज़ल

बेला, जुही, चमेली, चम्पा, हरसिंगार लिख दे

बेला, जुही, चमेली, चम्पा, हरसिंगार लिख दे कैसे कोई शायर पतझर को बहार लिख दे उसको खुदा ने आँखें दी हैं तो क्या इसीलिए उडती हुई धूल को सावन की फुहार लिख दे उसने ठान लिया है रस्ते से पहाड़ हट जाय उस चींटी के नाज़ुक दिल को बेकरार लिख दे इक बँधुआ मजदूर के […]