कविता

कलियुग का रावण

विनाश काले विपरीत बुद्धि इस कथनी का मारा हूँ । जानकी अपहरण करके मै खुद अब तक भी पछताता हूँ । सुन पुकार जानकी की तब राम दौड़े आ जाते थे। रघुकुल रीत निभाने को तब मृत्यु से भी लड़ जाते थे । दुःख होता है देख के मुझको रुदन कर रही है कई सीताये […]