कविता

हिम आच्छादित धरती रहते

हिम आच्छादित धरती रहते, हिय वसंत हम कितने देखे ! भावों से भास्वर जगती पै, आयामों के पहरे निरखे ! सिमटे मिटे समाये कितने, अटके खटके चटके कितने; चोट खसोटों कितने रोये, आहट पाए कितने सोये ! खुल कर खिल कितने ना पाए, रूप दिखा ना कितने पाए; मन की खोह खोज ना पाए, तन […]

गीत/नवगीत

भव भय से मुक्त अनासक्त

भव भय से मुक्त अनासक्त, विचरि जो पाबत; बाधा औ व्याधि पार करत, स्मित रहबत ! वह झँझावात झेल जात, झँकृत कर उर; वो सोंपि देत जो है आत, उनके बृहत सुर ! जग उनकौ लहर उनकी हरेक, प्राणी थिरकत; पल बदलि ज्वार-भाटा देत, चितवन चाहत ! चहुँ ओर प्रलय कबहु लखे, लय कभू लगे; […]

कविता

मधुगीति – पतझड़ में जो पत्ते देखे

पतझड़ में जो पत्ते देखे, कहाँ समझ जग जन थे पाए; रंग बिरंगे रूप देख के, कुछ सोचे वे थे हरषाये! क्या गुज़री थी उनके ऊपर, कहाँ किसी को वे कह पाए; विलग बृक्ष से होकर उनने, अनुभव अभिनव कितने पाए ! बदला वर्ण शाख़ के ऊपर, शिशिर झटोले कितने खाए; धूप ताप हिम की […]

गीतिका/ग़ज़ल

मधुगीति – तुम सुर में बसी उनकी झलक!

तुम सुर में बसी उनकी झलक, लख लिया करो; आओ न आओ उनकी ग़ज़ल, गा लिया करो ! दरम्यान उनके औ तुम्हारे, दूरियाँ कहाँ; दरवाज़ा खोल बार बार, मिल लिया करो ! आँखों का नूर चित को चूर, करता रहा है; आहिस्ते बना रिश्ते खुद को, खो दिया करो ! खोये वहीं हैं हर ही […]

गीत/नवगीत

मधुगीति – नेत्र जब नवजात का झाँका किया!

नेत्र जब नवजात का झाँका किया, शिशु जब था समय को समझा किया पात्र की जब विविधता भाँपा किया, देश की जब भिन्नता आँका किया ! हर घड़ी जब प्रकृति कृति देखा किया, हर कड़ी की तरन्नुम ताका किया आँख जब हर जीव की परखा किया, भाव की भव लहरियाँ तरजा किया ! रहा द्रष्टा […]

सामाजिक

मातृ भाषाएँ व आध्यात्मिक प्रबंधन!

तत्व रूप में हिन्दी व अन्य सभी मातृ भाषाएँ भारत की ही नहीं विश्व भर की सम्पत्ति, धरोहर व अमानत हैं! जैसे धर्म हर मानव व जीव में प्रतिष्ठित है पर वह हर किसी को प्रतिष्ठित हुआ परिलक्षित नहीं होता, वैसे ही हिन्दी व अन्य सभी मातृ भाषाएँ जन मानस के हृदय की भाषा हैं […]

गीत/नवगीत

मधुगीति

उत्ताल ताल आकाश में आच्छादित है, मधुर वायु अधर का स्पर्श लिये आई है; अग्नि त्रिकोणीय आभा ले दीप्तिमान हुई है, जल हर जलज की प्राण-प्रतिष्ठा में लगा है ! धरा पर सब उनके साये में धाये हैं, अपने तन मन को आत्मयोग में डुबाये हैं; बुद्धि की हर तरंग पै तरजे लरजे़ हैं, ध्यान […]

गीत/नवगीत

मधुगीति – प्रभु कृपा से अभिभूत सब !

प्रभु कृपा से अभिभूत सब, आनन्द अद्भुत पा रहे; मिल परस्पर उनसे मिले, आशीष उनका भा रहे ! रचते वही गाते वही,  गोते वे ही लगवा रहे; अन्तर में धुन कुछ छेड़ कर, वे ही सुधा सरसा रहे ! आते कभी वे निकट से, नित दूरियाँ मिटवा रहे; पहचान कुछ २ पा रहे, क्यों आ […]

कविता

आँसुओं में जब कोई मुझको लखा !

आँसुओं में जब कोई मुझको लखा, दास्तानों का उदधि वरवश चखा; दीनता की मम हदों को वह तका, क्षुद्रता की शुष्कता को वह चखा ! अभीप्सा मन मेरे में जो भी रही, शिक्षा दीक्षा जो हृदय मेरे रही; जगत ने जो उपेक्षा मेरी करी, भक्ति की जो भाव धारा मन भरी ! लख सका था […]

कविता

मेरी सत्ता लगे कभी पत्ता !

मेरी सत्ता लगे कभी पत्ता, जाती उड़ कभी वही अलबत्ता; लखे खद्योत कभी द्योति तके, ज्योति संश्लेत कभी स्रोत लखे ! भूल मैं जाता कभी जो तरता, भटक में पाता कभी जो खोता; अटक मैं जाता कभी आहिस्ता, पार कर जाता कभी जग सरिता ! त्याग की सीमा कभी मैं वरता, सोच की हद से […]