कविता

ऊर्ध्व उठ देख हैं प्रचुर पाते

ऊर्ध्व उठ देख हैं प्रचुर पाते, झाँक आवागमन बीच लेते तलों के नीचे पर न तक पाते, रहा क्या छत के परे ना लखते ! छूट भी बहुत कुछ है जग जाता, मिलना नज़दीक से न हो पाता भीड़ से वास्ता न बहु होता, रहा टक्कर का डर भी ना होता ! देख पाते हैं […]

कविता

कण कण में कृष्ण क्रीड़ा किए

कण कण में कृष्ण क्रीड़ा किए, हर क्षण रहते; कर्षण कराके घर्षण दे, कल्मष हरते! हर राह विरह विरागों में, संग वे विचरते; हर हार विहारों की व्यथा, वे ही हैं सुधते! संस्कार हरेक करके वे क्षय, अक्षर करते; आलोक अपने घुमा फिरा, ऊर्द्ध्वित त्वरते! कारण प्रभाव हाव भाव, वे ही तो भरते; भावों अभावों देश काल, वे ही घुमाते! थक जाते राह चलते, वे ही धीर बँधाते; मँझधार बीच तारक  बन, ‘मधु’ को बचाते! ✍🏻 गोपाल बघेल ‘मधु’

धर्म-संस्कृति-अध्यात्म

आध्यात्मिक संचरण व जागतिक जागरण! 

अध्यात्म की कई अवस्थाएँ हैं। शारीरिक व मानसिक स्तर पर अनेक प्रस्फुरण हैं। कुछ अवस्थाओं में कोई व्यक्ति अच्छा समाज सुधारक व राजनीतिज्ञ व राजनेता भी हो सकता है। हर किसी के अपने अपने भाव, संस्कार व उद्देश्य हैं और देश काल पात्र की आवश्यकतानुसार हर कोई वश परवश, जाने अनजाने सृष्टि सेवामें संलिप्त है। […]

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तल रहे कितने अतल सृष्टि में

तल रहे कितने अतल सृष्टि में, कहाँ आ पाते सकल द्रष्टि में मार्ग सब निकट रहे पट घट में, पहरे ताले थे रहे भ्रकुटि में ! खोले जो चक्र रहे जाना किए, राह हर सहज सूक्ष्म ताड़ा किए देर जाने में कभी ना वे किए, ज़रूरी जहाँ हुआ पहुँचा किए ! जीव बंधन में रहे […]

कविता

वे किसी सत्ता की महत्ता के मुँहताज नहीं !

वे किसी सत्ता की महत्ता के मुँहताज नहीं, सत्ताएँ उनके संकल्प से सृजित व समन्वित हैं; संस्थिति प्रलय लय उनके भाव से बहती हैं, आनन्द की अजस्र धारा के वे प्रणेता हैं ! अहंकार उनके जागतिक खेत की फ़सल है, उसका बीज बो खाद दे बढ़ाना उनका काम है; उसी को देखते परखते व समय […]

कविता

अहंकारों की अनंत आँधी में,

अहंकारों की अनंत आँधी में, विचरती विकारों की व्याधि में; उड़े कितने ही व्यथाएँ पाते, स्थिति अपनी कहाँ लख पाते ! वृद्ध होकर भी युद्ध रत रहते, यों ही बिन बात के विकल होते; जुड़े रिश्तों से वृथा ही रहते, यथायथ रहके विश्व ना रमते ! तटस्थ हो के जब कभी लखते, तिनके तिनके का […]

कविता

खेलने खाने दो उनको,

खेलने खाने दो उनको, टहल कर आने दो उनको; ज़रा गुम जाने दो उनको, ढूँढ ख़ुद आने दो उनको ! नहीं कोई कहीं जाता, बना इस विश्व में रहता; स्वार्थ में रम कभी जाता, तभी परमार्थ चख पाता ! प्रयोगी प्रभु उसे करते, जगत बिच स्वयं ले जाते; हनन संस्कार करवाते, ध्यान तब उनका लगवाते […]

कविता

आए हैं अलग रहते थलग

आए हैं अलग रहते थलग, जाएँगे विलग; सहचर हैं रहे सूक्ष्म काल, संचरी सुमग ! सौंदर्यवान सुभग धरा, रहत हमरे पग; एक नभ में उठत आगे बढ़त, धरिणी एक डग ! सोहे हैं श्याम मुरली अधर, सुर ले मनोहर; हैं व्याप्त लगे नयन कोर, अभय दिए उर ! आधार धार परे रहा, धुरी पर विचर; […]

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शिव सरिस नृत्य करत रहत

शिव सरिस नृत्य करत रहत, निर्भय योगी; सद्-विप्र सहज जगत फुरत, पल पल भोगी ! भव प्रीति लखत नयन मेलि, मर्मर सुर फुर; प्राणन की बेलि प्रणति ढ़ालि, भाव वाण त्वर ! तारक कृपाण कर फुहारि, ताण्डव करवत; गल मुण्ड माल व्याघ्र खाल, नागमणि लसत ! ज्वाला के जाल सर्प राज, शहमत रहवत; गति त्रिशूलन […]

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सुनके ज़्यादा भी करोगे तुम क्या

सुनके ज़्यादा भी करोगे तुम क्या, ध्वनि कितनी विचित्र सारे जहान; भला ना सुनना आवाज़ें सब ही, चहते विश्राम कर्ण-पट देही ! सुनाया सुन लिया बहुत कुछ ही, सुनो अब भूमा तरंग ॐ मही; उसमें पा जाओगे नाद सब ही, गौण होएँगे सभी स्वर तब ही ! राग भ्रमरा का समझ आएगा, गुनगुना ब्रह्म भाव भाएगा; सोच हर हिय का ध्यान धाएगा, कान कुछ करना फिर न चाहेगा ! जो भी कर रही सृष्टि करने दो, सुन रहे उनको अभी सुनने दो; सुनो तुम उनकी सुने उनको जो, सुनाओ उनको लखे उनको जो ! गूँज जब उनकी सुनो लो थिरकन, बिखेरो सुर की लहर फुरके सुमन; बना ‘मधु’ इन्द्रियों को उर की जुवान, रास लीला में रमे ब्रज अँगना ! ✍🏻 गोपाल बघेल ‘मधु’