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  • खेवत उर केवट बनि

    खेवत उर केवट बनि

    खेवत उर केवट बनि, केशव सृष्टि विचरत; सुर प्रकटत सुधि देवत, किसलय हर लय फुरकत ! कालन परिसीमा तजि, शासन के त्रासन तरि; कंसन कौ चूरि अहं, वंशन कौ अँश तरत ! हँसन कौ मन समझत,...


  • मोहन कूँ देखन कूँ

    मोहन कूँ देखन कूँ

    मोहन कूँ देखन कूँ, तरसि जातु मनुआँ; देखन जसुमति न देत, गोद रखति गहिया ! दूर रखन कबहुँ चहति, प्रीति करति खुदिइ रहत; डरति रहति उरहि रखति, गावत कछु रहिया ! थकति कबहुँ रुसति कबहुँ, नाचत...

  • किलकावत काल पुरुष !

    किलकावत काल पुरुष !

    किलकावत काल पुरुष, धरती पै लावत; रोवन फिरि क्यों लागत, जीव भाव पावत ! संचर चलि जब धावत, ब्राह्मी मन होवत; महत अहम चित्त भ्रमत, पंच भूत होवत ! प्रतिसंचर प्राण पात, वनस्पति जन्तु होत; मनुज...

  • वारौ सौ न्यारौ सौ !

    वारौ सौ न्यारौ सौ !

    वारौ सौ न्यारौ सौ, ब्रज कौ कन्हैया; प्यारौ दुलरायौ सौ, लागत गलबहियाँ ! भेद भाव कछु ना मन, चित्त प्रमित भास्वर घन; व्यस्त चकित रह थिरकित, किलकत कुहकत फुरकत ! जानत हर मन की गति, हर...