कविता

शिव सरिस नृत्य करत रहत

शिव सरिस नृत्य करत रहत, निर्भय योगी; सद्-विप्र सहज जगत फुरत, पल पल भोगी ! भव प्रीति लखत नयन मेलि, मर्मर सुर फुर; प्राणन की बेलि प्रणति ढ़ालि, भाव वाण त्वर ! तारक कृपाण कर फुहारि, ताण्डव करवत; गल मुण्ड माल व्याघ्र खाल, नागमणि लसत ! ज्वाला के जाल सर्प राज, शहमत रहवत; गति त्रिशूलन […]

कविता

सुनके ज़्यादा भी करोगे तुम क्या

सुनके ज़्यादा भी करोगे तुम क्या, ध्वनि कितनी विचित्र सारे जहान; भला ना सुनना आवाज़ें सब ही, चहते विश्राम कर्ण-पट देही ! सुनाया सुन लिया बहुत कुछ ही, सुनो अब भूमा तरंग ॐ मही; उसमें पा जाओगे नाद सब ही, गौण होएँगे सभी स्वर तब ही ! राग भ्रमरा का समझ आएगा, गुनगुना ब्रह्म भाव भाएगा; सोच हर हिय का ध्यान धाएगा, कान कुछ करना फिर न चाहेगा ! जो भी कर रही सृष्टि करने दो, सुन रहे उनको अभी सुनने दो; सुनो तुम उनकी सुने उनको जो, सुनाओ उनको लखे उनको जो ! गूँज जब उनकी सुनो लो थिरकन, बिखेरो सुर की लहर फुरके सुमन; बना ‘मधु’ इन्द्रियों को उर की जुवान, रास लीला में रमे ब्रज अँगना ! ✍🏻 गोपाल बघेल ‘मधु’

गीत/नवगीत

भगवा किया तुमने कोरोना

भगवा दिया है भगवा किया, तुमने कोरोना; हर हिय को सिखा कुछ है दिया, प्यार कराना! करने लगे हैं नमस्कार, संस्कार फुर; हैं शाकाहारी होने लगे, तुमसे गए डर! नर नारी चोट खाए गहरी, देख बीमारी; यह महामारी आई करने, कुछ है विचारी! फुलवारी सारी सजी रहे, उसकी तैयारी; कुछ घास फूँस झाड़ फूँक, करती […]

कविता

कोरोना

संसार कितना बदल दिया, तुमने कोरोना; हर ज़िंदगी को बना दिया, तुमने खिलौना! रोका है आना जाना, मिलना और मिलाना; संयत किया है खाना पीना और खिलाना! आयोजनों को करके ख़त्म, शून्य झँकाना; बाहर की दुनियाँ देखे बिना, अन्तस तकना! तज तामसी अहार, गति सात्विक वरना; भय वश बदलना वृत्ति, प्रकृति महिमा समझना! लौटा के […]

कविता

काल चक्र घूमता है !

काल चक्र घूमता है, केन्द्र शिव को देखलो; भाव लहरी व्याप्त अगणित, परम धाम परख लो! कितने आए कितने गए, राज कितने कर गए; इस धरा की धूल में हैं, बह के धधके दह गए ! सत्यनिष्ठ जो नहीं हैं, स्वार्थ लिप्त जो मही; ताण्डवों की चाप सहके, ध्वस्त होते शीघ्र ही ! पार्थ सूक्ष्म […]

कविता

हिम आच्छादित धरती रहते

हिम आच्छादित धरती रहते, हिय वसंत हम कितने देखे ! भावों से भास्वर जगती पै, आयामों के पहरे निरखे ! सिमटे मिटे समाये कितने, अटके खटके चटके कितने; चोट खसोटों कितने रोये, आहट पाए कितने सोये ! खुल कर खिल कितने ना पाए, रूप दिखा ना कितने पाए; मन की खोह खोज ना पाए, तन […]

गीत/नवगीत

भव भय से मुक्त अनासक्त

भव भय से मुक्त अनासक्त, विचरि जो पाबत; बाधा औ व्याधि पार करत, स्मित रहबत ! वह झँझावात झेल जात, झँकृत कर उर; वो सोंपि देत जो है आत, उनके बृहत सुर ! जग उनकौ लहर उनकी हरेक, प्राणी थिरकत; पल बदलि ज्वार-भाटा देत, चितवन चाहत ! चहुँ ओर प्रलय कबहु लखे, लय कभू लगे; […]

कविता

मधुगीति – पतझड़ में जो पत्ते देखे

पतझड़ में जो पत्ते देखे, कहाँ समझ जग जन थे पाए; रंग बिरंगे रूप देख के, कुछ सोचे वे थे हरषाये! क्या गुज़री थी उनके ऊपर, कहाँ किसी को वे कह पाए; विलग बृक्ष से होकर उनने, अनुभव अभिनव कितने पाए ! बदला वर्ण शाख़ के ऊपर, शिशिर झटोले कितने खाए; धूप ताप हिम की […]

गीतिका/ग़ज़ल

मधुगीति – तुम सुर में बसी उनकी झलक!

तुम सुर में बसी उनकी झलक, लख लिया करो; आओ न आओ उनकी ग़ज़ल, गा लिया करो ! दरम्यान उनके औ तुम्हारे, दूरियाँ कहाँ; दरवाज़ा खोल बार बार, मिल लिया करो ! आँखों का नूर चित को चूर, करता रहा है; आहिस्ते बना रिश्ते खुद को, खो दिया करो ! खोये वहीं हैं हर ही […]

गीत/नवगीत

मधुगीति – नेत्र जब नवजात का झाँका किया!

नेत्र जब नवजात का झाँका किया, शिशु जब था समय को समझा किया पात्र की जब विविधता भाँपा किया, देश की जब भिन्नता आँका किया ! हर घड़ी जब प्रकृति कृति देखा किया, हर कड़ी की तरन्नुम ताका किया आँख जब हर जीव की परखा किया, भाव की भव लहरियाँ तरजा किया ! रहा द्रष्टा […]