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  • कुंडलियाँ….

    कुंडलियाँ….

    आँगन मन  इठला रहा, एक अधखिला फूल। घात अमित्र सम वात की, चुभा गयी थी शूल। चुभा गयी थी शूल, फूल मुरझाया ऐसे। यत्न वृथा सब आज, खिला न पहले जैसे। “अनहद” महत विषाद, लगे ये...

  • कुंडलियाँ छ्न्द……

    कुंडलियाँ छ्न्द……

      लगता मेघों ने किया, गठबंधन मजबूत। इंद्रदेव का आज तो, बना दिवाकर दूत। बना दिवाकर दूत, समय पर हर दिन आता। तांडव करता रोज, उगल के ज्वाला जाता। जले जलाशय कुंड, विकल हो मानव जलता।...



  • मुक्तक….

    मुक्तक….

    अ_ढ़े जिद पे रहो न तुम कि बोलो प्रेम के आखर। मुहब्बत है अगर हमसे न तोलो प्रेम के आखर। नयन सब राज हैं खोलें अधर बैठाये क्यों पहरे- पढ़ो “अनहद” से ये नैना कि घोलो...