सामाजिक

बिदेस में रहते लोग

भारत में बैठे लोगों को बहुत बातों का पता नहीं होता कि बिदेस में भारतीय कैसे रहते हैं और उन के मन में अपने देश के प्रती कितना लगाव होता है। सही बात तो यह है कि देश प्रेम क्या होता है, यह देश से बाहर आकर ही पता चलता है। एक बात तो सही […]

संस्मरण

बस कंडक्टर की ट्रेनिंग

1966 में मुझे इंगलैंड की एक बस कम्पनी में बस कंडक्टर की नौकरी मिल गई थी। ट्रेनिंग के लिए हम चार दोस्त बस डीपो पहुँच गए। हर रोज़ की तरह वहां सीनियर इंस्पैक्टर मिस्टर लाली हमारा इंतज़ार कर रहा था। लाली ने गुड़ मॉर्निंग बोल कर आज थोड़ा सा बसों के बारे में बताया कि […]

लघुकथा

आँखें

रौशनी पंद्रा सोला वर्षय एक खूबसूरत लड़की तो थी ही, मगर इस से भी ज़्यादा फुर्तीली काम काज में माहिर और गाने में सुरीली आवाज़ की मालिक थी। हर सुबह वोह माँ के साथ बाबा नानक जी की फोटो के सामने खड़ी हो कर अरदास में शामिल होती, फिर वोह बगीचे में जा कर फूलों […]

कहानी

कुछ नहीं

खाना खाने के लिए मेरी अपनी अकेले की जगह है और वोह है किचन टेबल के साथ। यहाँ मेरे लिए एक डिसेबल चेअर है। यों तो घर में कहीं भी बैठ कर खा लेता हूँ लेकिन मेरी आसानी के लिए किचन में ही सेफ्टी चेअर जो सिर्फ मेरे लिए ही है, उस में बैठ कर ही मज़े […]

लघुकथा

लघुकथा – असमंजस

भगवान् है या नहीं है, मेरा इसमें किसी से भी कोई संवाद करने को मन नहीं होता । सच्ची बात कहूं, दरअसल मैं कोई धर्मी नहीं हूँ। न तो मैं धर्म अस्थान में जाता हूँ और जाहर है न कोई धार्मिक समागम करवाता हूँ। मैं तो बस एक ही बात में विशवास रखता हूँ की मैं एक […]

कहानी

दारी

दारी, तांगे वाले को हमारे गाँव के सभी लोग जानते थे। जब पहली दफा हमारे गाँव से शहर को सड़क बनी थी तो उस वक्त अभी कोई बस नहीं होती थी। यह दारी ही था जिस ने अपना तांगा इस सड़क पर चलाना शुरू किया था। जो लोग, औरतें और मर्द साइकल नहीं चला सकते […]

सामाजिक

मदर टरेसा आफ इंडिया : डा. सिंधुताई सपकाल

विश्व महिला दिवस पर विशेष ब्लॉग्स पढ़ते हुए डॉ. सिंधुताई सपकाल के बारे में पढ़ा. डॉ. सिंधुताई सपकाल की कठिन तपस्या और समाज सेवा के बड़े काम के बारे में जानकर मुझे लगा, कि उन्हें मदर टेरेसा ऑफ इंडिया कहा जा सकता है. उनके जीवन और समाज सेवा के बारे में कुछ लिखना चाहूंगा. डॉ. […]

लघुकथा

शाहजहाँ और उस की इन्वैस्टमैंट

एक चांदनी रात को बादशाह शाहजहान, ताजमहल के इर्द गिर्द घूम रहे थे। कभी वोह संगमरमर के बने हुए बैंच पर बैठ जाते, कभी बहते चश्मों में ताजमहल के अक्स को देखते। आज वोह बहुत उदास थे। यूँ तो बहुत से लोग हर रात को आ जाते और पुरानी बातों को ले कर गुफ्तगू करते […]

लघुकथा

गुरदई

गुरदई, सारे मुहल्ले की रौनक होती थी। उस की उम्र कितनी होगी, किसी को कभी ख्याल ही नहीं आया। उमर पूछ कर करना भी किया था, उस के मुंह और कलाइओं से ढुलकता हुआ मांस ही उस का बर्थसर्टीफिकेट था। गर्मियों के दिनों में उस की चारपाई नीम के पेड़ के नीचे होती और सर्दियों […]

लघुकथा

बातों में बात

बात शायद 1952 53 की होगी जब फिल्म आवारा आई थी। उस में राजकपूर ने जो ऊंची पैंट पाई हुई थी, जो कुछ ऊपर को फोल्ड की हुई थी, गाँव के कुछ लड़कों ने भी इस की नक़ल करनी शुरू कर दी थी। गाँवों के लड़के उन दिनों ज़्यादा पाजामे ही पहनते थे, चार पांच […]