कविता पद्य साहित्य

भीष्म-युद्धिष्ठिर संवाद

प्रणाम कुलशीर्ष पितामह! आशीष धर्मराज! अनुकंपा है केशव की तुम पर। कहो! याचक बनकर अभीष्ट वर मांगने…. या संशय के तम में दिशाहीन जीवन-नौका…! अन्तरतम की पीड़ा का सार चिह्नते आप हूक हिलोरे रह-रह जाती विचलित करती मन को शर्बरी निज हिय धर्म नहीं अब… प्रकृति न थी मेरी हिंसा का व्यापार। पश्चात युद्ध! तरस […]

कविता पद्य साहित्य

बबूल

नीरव पथ सुनसान फिजा में,  एक अकेला मैं कुरूप बबूल।  करते जाते मनचाही क्रिया,  बागों वालों की है भूल।  सड़क किनारे उजड़ बस्ती में,  मैं खुश हूँँ अपनी मस्ती में।  माना उपेक्षित हूँँ मैं,  फलदार छायादार वृक्षों से, कट जाता हूँँ आमों के लिए,  उजड़ जाता हूँँ बागों के लिए।  है उचित जन समुदाय की […]

लेख सामाजिक

आधुनिकता : एक बोध

सृष्टि का रथ कालचक्र के अनुसार चल रहा है। सृष्टि के इस रथ को भला कौन है ऋजु-वक्र चला सकता है ? मनुष्य ने अध्ययन की सुविधा के लिए हर युग को कालखंडों में विभाजित किया। किसी भी कालखंड में यंत्रों का अभाव नहीं था। कालखंडों में युग को विभाजित तो कर दिया लेकिन मानवता […]

गीत/नवगीत

मेघा

अरावली के उत्तुंग शिखर, मेघा फिर-फिर आते है। बैठ पहाड़ी के कंधे पर, सावन का गीत सुनाते है। बंग खाड़ी से आये मेघा, भारत भ्रमण राग सुनाते है। लौटे हिम संदेशा लेकर, गर्जन से खबर सुनाते है। लौट पहाड़ों के कंधो पर, मार्ग की थकन मिटाते है। हँसते जाते,कहते गाते, वृक्षों से पाँव दबाते है। […]

लेख सामाजिक

नारी : श्रृंगार और विज्ञान

हमारी सनातन आर्य संस्कृति में कोई भी परंपरा अतार्किक और अवैज्ञानिक नहीं है । परंपराओं के उद्भव के पीछे के हेतु अवश्य ही स्वास्थ्य,भौगोलिक,सामाजिक,देशकालीन परिस्थिति रही हैं। बहुत कुछ संभव है कि इन परंपराओं का नियमन जीवन में उत्पन्न समस्याओं के निदान के पश्चात जीवन के विकास तथा सामाजिक जीवन के लिए किया गया है […]

कविता

जग प्रतिपल मूढ़ बना जाता

जग प्रतिपल मूढ बना जाता।  मैं हर पल कर्म समा जाता।  सत पथ प्रण निभा जाता।  फिर ! मैं उस छोर चला जाता।  जग प्रतिपल मूढ बना जाता।  यह संसार न मुझको भाता।  है नहीं जग से भी कोई नाता।  प्रतिपल जग मुझको ठुकराता।  कपटी संसार न मुझको भाता । जग प्रतिपल मूढ बना जाता। […]

गीत/नवगीत

राजस्थानी पावस गीत

चार दिना रो जोबनो, कोई ना करज्यो देर। पल दो पल का जीवणा, फेर दिना रे फेर। बलम जी ! आई बरसण री रूत, देश म्हँ देश म्हँ। थे करज्यो ना मत देर पीव जी ! आओं जी आओं देश म्हँ, देश म्हँ। आकासा माँँय चमक्कै बिजली, बिजली ! घम घम घूघराँ सा घमक्कै घन […]

कविता

दम तोड़ती कविता और कवि मनु

  कवि मनु के दो कण आये, आज संशय की झोली में । दम तोड़ती कविता भरते, रिक्त ज्ञान की डोली में । अतल तरंगित लहरों सा मन, कविता हिचकोले खा जाती । शब्दों के घन घुमड़ आते, तड़ित भावों में कौधें जाती । नग्न फटेहाल,हो अश्रुपात, जन व्यथा का करुण भार। कवि मनु हो […]

गीत/नवगीत

गरज उठा फिर ! सिंह आज

गरज उठा फिर ! सिंह आज कायर स्यार छिपा है माद गड़ी है आँँखें उल्लू की सरहद पर लोमड़ नाद मची भगदड़ अरिदल में होंगे ढेर वहीं खंदल में कफन मिला हिम-गरल में शव मिले गलवान तरल में क्यों ! गरज उठा फिर ! सिंह आज हुई शहादत वीरों की खौला खून जवानों का निहत्थे […]