सामाजिक

व्यावहारिक अर्थशास्त्र

व्यावहारिक अर्थशास्त्र (या बिहेवियरल इकोनॉमिक्स), जिसके लिए इस वर्ष रिचर्ड एच थेलर को नोबेल पुरस्कार मिला है, बड़ी दिलचस्प चीज़ है। पैसों के मामले में लोग सिर्फ दिमाग से फैसले नहीं लेते। अक्सर इंसानी जज्बात दिमाग पर हावी हो जाते हैं, इसलिए आर्थिक मामलों को समझने के लिए अर्थशास्त्र के साथ मनोविज्ञान को समझने की […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

ख्वाब में यूँ नहीं आया जाया करो। ख़्वाब में आ नहीं अब सताया करो। याद आते बहुत हो मुझे रात दिन, इस तरफ भी कभी घूम जाया करो। झूठ बोलो नहीं फायदे के लिये, सच को सच ही हमेशा बताया करो। प्यार को तुम तिजारत समझते अगर, प्यार देकर यहाँ प्यार पाया करो। चाहते हो […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

पागलपन को इज़्ज़त कैसी। नफरत से ये उल्फत कैसी। काबिल अपना लीडर है पर, जनता की है हालत कैसी। दंगा दंगा खेल रहे सब, झेल रहे हम आफत कैसी। मँहगी मँहगी चीज़ यहाँ सब, आखिर ये है राहत कैसी। सन्यासी हो माना हमने, सत्ता की फिर चाहत कैसी। नफरत नफरत दिखती हर सू , उल्फत […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल – निर्मल  काया

निर्मल  मन  रख निर्मल  काया। जिसने    जैसा    सोचा   पाया। सब कह डाला शब्द सरल रख, मन   में   मेरे   जो   भी  आया। लाख  हसीं  हैं   यूँ  दुनिया  में, मन  को   मेरे   तू   ही  भाया। मान  अमानत   का  रक्खा  है, हक़दारों  तक  हक़  पहुँचाया। छोड़ी हरगिज़ राह न हक़ की, शैतां   ने   अजहद  बहकाया। — हमीद कानपुरी

गीतिका/ग़ज़ल

हिन्दी

नये अब गुल खिलाना चाहती है। ये खुलकर मुस्कुराना  चाहती है। दिलों में घर  बनाना  चाहती  है। नहीं कोई   खजाना  चाहती  है। शिकायत हर मिटाना चाहती है। सियासत को  हराना  चाहती है। नहीं कुछ भी  पुराना  चाहती है। नये  नगमे    सुनाना   चाहती है। अदावत को  मिटाना  चाहती है। समय अच्छा बिताना  चाहती है। जहां को  […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

सब दिखावा  है  सियासत  के  लिये। कर रहा  खिदमत  विरासत के लिये। कौन कहता  है कि उल्फत के लिये। आज  रिश्ते   सब ज़रूरत  के लिये। सोचने  भर   की  ज़रा  सी    देर  है। क्या नहीं मुमकिन रियासत के लिये। छोड़ दी  दुनिया  न  सोचा एक  पल, आपकी  केवल  मुहब्बत   के  लिये। आज   सीरत    देखता  ही   कौन […]

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

सदियों    पहले    की   बीमारी। ज़ुल्म सितम है  अब तक जारी। खूब    मलाई     खाते    लीडर, जनता    फिरती    मारी   मारी। सब  कुछ  तो  है पब्लिक जाने, किस   से   करता    पर्दे   दारी। कल  तक   रहती  थी वो  पीछे, अब   रहती   है    आगे    नारी। सोच  ज़रा  मत  जीत  पराजय, खेल  लगा   मन  अपनी  पारी। — हमीद कानपुरी अब्दुल हमीद […]

मुक्तक/दोहा

हमीद के दोहे

दहकां के दुख दर्द का,तनिक नहीं आभास। वोटन  खातिर  गाँव  में , झूठा  करें  प्रवास। जनता किस बूते करे, इन पर फिर विश्वास। वर्तमान को  खोद कर , बदल रहे इतिहास। खास ज़हनियत  के रहे , हरदम ये तो दास। शासन  इनका यूँ नहीं , आता सब को रास। बालिंगका लगतानहीं,अनुभव उसको खास। रोहित   बल्लेबाज़   […]

गीतिका/ग़ज़ल

बालमन

जोश सब  में भरे  बालमन। शाद दिल को करे बालमन। खौफ रखता  परे  बालमन। कब किसी से  डरे बालमन। प्रेम की  जब हवा आ  लगे, फूल  जैसा   झरे  बालमन। प्रेम का  खाद  पानी  मिले, खूब जमकर फरे बालमन। ठान ले  बात  कोई  अगर, फिर  न  टारे  टरे बालमन। — हमीद कानपुरी

गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

साथ  तेरे  जब  से  मैं  आया गया। गीत  मेरा   हर  जगह  गाया  गया। फैसला  हक़  में न  फरमाया गया। हर  तरह  से  खूब  बहकाया गया। उंगलियाँ  जज़  पर उठाता  है वही, हक़ ब जानिब जो न ठहराया गया। मारता  था  ठोकरें जो  कल तलक, ठोकरों  में   आज  वो  पाया  गया। हम क़दम था  ऱौशनी में  […]